Sunday, September 8, 2013

हम मुज़फ्फरनगर वाले हैं

पिछले कुछ दिनों से मन बहुत विचलित हैं . बार बार माँ के घर फ़ोन करके पूछती हूँ कि सब ठीक से हो न , कोई भी सरवट या पचेंडा की तरफ मत जाना , बच्चोको घर के अंदर रखना , बार बार अपना मुज़फ्फर पेज ओपन करती हूँ बार बार वहां पर लोगो के कमेंट पढ़ती हूँ .. बस सब ठीक हो यह प्रार्थना भी करती हूँ .
वैसे कोई पहलीबार मुज़फ्फरनगर इस तरह दंगो की चपेट मैं नहीआया हैं , यहाँ पर लोग बहुत ही असहिष्णु हैं , जरा जरा सी बात पर मार - काट की किस्से यहाँ के लोकल अखबारों मैं अक्सर पढने को मिलते हैं . पैस से बहुत ही अमीर परन्तु जल्दी ही गुस्से में आजाने वाले यहाँ के मूल निवासी जब दोस्ती करते हैं तो भी ज़मकर और जब खुंदक में आ जाते हैं तो भी न आव देखते हैं न ताव, तब कितना नुकसान हुआ उसको देखकर बाद मैं पश्चाताप भी बहुत करते हैं . आपसी सौहर्दय से भी रहते हैं यहाँ बहुत सारे लोग . ईद पर और दीवाली पर अक्सर यह सौहर्दय देखने को मिलता नगर क्षेत्र मैं ... जिस बात को लेकर यह दंगा हुआ छोटी बात तो नही थी अपनी बहन को छेड़ने पर भाई का सामने आना लाजमी था .हाँ उसके बाद जो कतल-इ- आम हुआ वोह गलत हुआ ..और उस आग में हिन्दू और मुसलमान दोनों सम्प्रदायों के नेताओ ने जो रोटिया सेंकी हैं उस'से उन्हें फायदा होगा या नही समय बताएगा परन्तु आज न जाने कितने घर उजाड़ गये . पंचायत मैं गये लोगो पर जब घात लगाकर हमला बोला गया तो ना जाने कितने बूढ़े जवान गायब हो गये नदी में कूद कर जान बचानी पढ़ी कुछ लोगो को ... नेट पर खबरे पढ़कर जब माँ को सुनाई तो माँ बोली ऐरे ऐसा तो जब पकिस्तान बना था तब हुआ था इस तरह घात लगाकर हमला . अफवाहों का बाजार इस वक़्त बहुत गरम हैं पता नही कितना सच हैं कितना झूठ , एक बाजार में मुस्लिम की दुकाने जला दी गयी उनके बच्चे भी उसी दुकान की कमाई से जिन्द्दगी के सपने बन रहे थे , बात परवरिश की हुयी बात माहौल की हुई जरा सा संयम देखाने से आज घरो में सिसिकिया और आशंकाए न गूंज रही होती .आज हर मं
दिर मस्जिद में अपनी अपनी कौम की मीटिंग्स हो रही हैं सेना गश्त लगा रही हैं ..........कभी कभी तो मैं सोचती हूँ यह सेना बनी किस लिय थी बाहरी दुश्मनों से रक्षा के लिय या यह घर के लोगो को आपस में लड़ने पर बिच बचाव करने के लिय .जरा सा कुछ होता नही कि सेना को बुला लो ऐरे जब सेना ही सब काम करेगी तो यह पुलिस या नेताओ और प्रशासनिक अधिकारियों की जरुरत ही क्या हैं नए कप्तान जो यहाँ के लोग का मिजाज नही जानते क्या सम्हाल पाएंगे ?

मेरी प्रार्थना हैं उन सब पिताओं से जिनके बच्चे भी उनके साथ आज असलहे लेकर घूम रहे हैं देखना आज नही तो कल इस असलहे तुम्हारे ही किसी अपने का खून भी बह सकता हैं .....जो पराये को मारने में जरा नही पसीजता वोह एक दिन अपने पर भी दया नही खायेगा वक़्त संयम का हैं अपने धर्म और कौम की इज्ज़त करे परन्तु हाँ और न के बीच एक पारदर्शी दीवार होती हैं इसलिय एक बार सोचे

दिल दुःख रहा हैं देखकर , बताकर . के हम मुज़फ्फरनगर वाले हैं ...... कल ऐसा न हो कि हम कहे किसी को कि हम मुज़फ्फरनगर वाले हैं तो लोग कहे ऐरे वही न "जहा न हिन्दू किसी का न मुसलमान किसी का
अरे बचा नही वहाँ तो अब ईमान किसी का "

Neelima sharrma
सब कुछ जल्दी सामान्य हो की प्रार्थना के साथ
 —

श्रीगणेश नाम स्मरण


गणेश चतुर्थी की सभी मित्रो को हार्दिक शुभकामनाये 
 सर्वप्रथम पूजनीय गणेश महाराज जी स्मरण नित्य किया जाना चाहिए  उसके पश्चात  उनके लिय विभिन्न मंत्रो का जाप करना चाहिए 

 चमत्कारी  श्रीगणेश नाम स्मरण 
प्रणम्यं शिरसां देवं गौरीपुत्र विनायकम्।

भक्तावासं स्मरेन्नित्मायु: कामार्थसिद्धये।।

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदतं द्वितीयकंम्।

तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।।

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।

सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टमम्।।

नवमं भालचद्रं च दशमं तु विनायकम।

एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननमं।।

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यं पठेन्नर:।

न च विघ्रभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो।।

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनं।

पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम।।

जपेद्गणपतिस्तोत्रम षड्भिर्मासै: फलं लभेत।

संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय:।।

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्य लिखित्वा य: समर्पयेत। तस्य विद्याभवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत:।।
~~~~
(गणेश भगवन के १०८ नाम )
1, ॐ श्री विघ्नेशाय नम: 
2, ॐ श्री विश्व्वरदाय नम: 
3, ॐ श्री विश्वचक्षुषे नम: 
4, ॐ श्री जगत्प्रभवे नम: 
5, ॐ श्री हिरण्यरुपाय नम: 
6, ॐ श्री सर्वात्मने नम: 
7, ॐ श्री ज्ञानरूपाय नम: 
8, ॐ श्री जगन्मयाय नम: 
9, ॐ श्री ऊर्ध्वरेतसे नम: 
10, ॐ श्री महाबाहवे नम: 
11, ॐ श्री अमेयाय नम: 
12, ॐ श्री अमितविक्रमाय नम: 
13, ॐ श्री वेदवेद्याय नम 
14, ॐ श्री महाकालाय नम: 
15, ॐ श्री विद्यानिद्यये नम: 
16, ॐ श्री अनामयाय नम: 
17, ॐ श्री सर्वज्ञाय नम: 
18, ॐ श्री सर्वगाय नम: 
19, ॐ श्री गजास्याय नम: 
20, ॐ श्री चित्तेश्वराय नम: 
21, ॐ श्री विगतज्वराय नम: 
22, ॐ श्री विश्वमूर्तये नम: 
23, ॐ श्री अमेयात्मने नम: 
24, ॐ श्री विश्वाधाराय नम: 
25, ॐ श्री सनातनाय नम: 
26, ॐ श्री सामगाय नम: 
27, ॐ श्री प्रियाय नम: 
28, ॐ श्री मंत्रिणे नम: 
29, ॐ श्री सत्वाधाराय नम: 
30, ॐ श्री सुराधीशाय नम: 
31, ॐ श्री समस्तसाक्षिणे नम: 
32, ॐ श्री निर्द्वेद्वाय नम: 
33, ॐ श्री निर्लोकाय नम: 
34, ॐ श्री अमोघविक्रमाय नम: 
35, ॐ श्री निर्मलाय नम: 
36, ॐ श्री पुण्याय नम: 
37, ॐ श्री कामदाय नम: 
38, ॐ श्री कांतिदाय नम: 
39, ॐ श्री कामरूपिणे नम: 
40, ॐ श्री कामपोषिणे नम: 
41, ॐ श्री कमलाक्षाय नम: 
42, ॐ श्री गजाननाय नम: 
43, ॐ श्री सुमुखाय नम: 
44, ॐ श्री शर्मदाय नम: 
45, ॐ श्री मुषकाधिपवाहनाय नम: 
46, ॐ श्री शुद्धाय नम: 
47, ॐ श्री दीर्घतुंडाय नम: 
48, ॐ श्री श्रीपतये नम: 
49, ॐ श्री अनंताय नम: 
50, ॐ श्री मोहवर्जिताय नम: 
51, ॐ श्री वक्रतुंडाय नम: 
52, ॐ श्री शूर्पकर्णाय नम: 
53, ॐ श्री परमाय नम: 
54, ॐ श्री योगीशाय नम: 
55, ॐ श्री योगधाम्रे नम: 
56, ॐ श्री उमासुताय नम: 
57, ॐ श्री आपद्धंत्रे नम: 
58, ॐ श्री एकदंताय नम: 
59, ॐ श्री महाग्रीवाय नम: 
60, ॐ श्री शरण्याय नम: 
61, ॐ श्री सिद्धसेनाय नम: 
62, ॐ श्री सिद्धवेदाय नम: 
63, ॐ श्री करुणाय नम: 
64, ॐ श्री सिद्धाय नम: 
65, ॐ श्री भगवते नम: 
66, ॐ श्री अव्यग्राय नम: 
67, ॐ श्री विकटाय नम: 
68, ॐ श्री कपिलाय नम: 
69, ॐ श्री ढुंढिराजाय नम: 
70, ॐ श्री उग्राय नम: 
71, ॐ श्री भीमोदराय नम: 
72, ॐ श्री शुभाय नम: 
73, ॐ श्री गणाध्यक्षाय नम: 
74, ॐ श्री गणेशाय नम: 
75, ॐ श्री गणाराध्याय नम: 
76, ॐ श्री गणनायकाय नम: 
77, ॐ श्री ज्योति:स्वरूपाय नम: 
78, ॐ श्री भूतात्मने नम: 
79, ॐ श्री धूम्रकेतवे नम: 
80, ॐ श्री अनुकूलाय नम: 
81, ॐ श्री कुमारगुरवे नम: 
82, ॐ श्री आनंदाय नम: 
83, ॐ श्री हेरंबाय नम: 
84, ॐ श्री वेदस्तुताय नम: 
85, ॐ श्री नागयज्ञोपवीतिने नम: 
86, ॐ श्री दुर्धषाय नम: 
87, ॐ श्री बालदुर्वांकुरप्रियाय नम: 
88, ॐ श्री भालचंद्राय नम: 
89, ॐ श्री विश्वधात्रे नम: 
90, ॐ श्री शिवपुत्राय नम: 
91, ॐ श्री विनायकाय नम: 
92, ॐ श्री लीलासेविताय नम: 
93, ॐ श्री पूर्णाय नम: 
94, ॐ श्री परमसुंदराय नम: 
95, ॐ श्री विघ्नांधकाराय नम: 
96, ॐ श्री सिंधुरवरदाय नम: 
97, ॐ श्री नित्याय नम: 
98, ॐ श्री विभवे नम: 
99, ॐ श्री प्रथमपूजिताय नम: 
100, ॐ श्री दिव्यपादाब्जाय नम: 
101, ॐ श्री भक्तमंदाराय नम: 
102, ॐ श्री शूरमहाय नम: 
103, ॐ श्री रत्नसिंहासनाय नम: 
104, ॐ श्री मणिकुंड़लमंड़िताय नम: 
105, ॐ श्री भक्तकल्याणाय नम: 
106, ॐ श्री कल्याणगुरवे नम: 
107, ॐ श्री सहस्त्रशीर्ष्णे नम: 
108, ॐ श्री महागणपतये नम:






Monday, August 26, 2013

माँ फिर कब आओगी

आज सुबह माँ की बहुत याद आरही थी मन कर रहा था कि बस एक बार नजर भर देख लू उनको सब कह रहे हैं कि माँ बहुत कमजोर हो गयीं हैं पीठ भी झुकने सी लगी हैं ...पर कभी अपनी तबियत और कभी घर की मसरूफियते जाने ही नही देती थी .आज ११ बजे पापा का फ़ोन आया की तुम्हारी माँ का मन बहुत उदास हैं तुमसे मिलने को ...तुम क्या बना रही हो? बिना प्याज का खाना बनाना तुम्हारी माँ और मैं तुम्हे मिलने आ रहे हैं बस २५-३० मिनट्स का लगेगे हमें पहुँचने में ...... सुस्ताई सी चाल में फुर्ती भर गयीं घर में शोर मच गया माँ आरही थी अरसे बाद मेरे घर बेटे ने जल्दी से डस्टिंग की बेडशीट्स बदल दी और मैंने रसोई में मोर्चा सम्हाला जहाँ आज दोपहर का मेनूखिचड़ी था वहाँ पनीर और दाल और करेले बन गये .पापा की पसंद के बिस्कुट मंगवाए .और माँ के आने पर जब हाथ पकड़ कर उनको इन्नोवा से उतारा आँसू ही नही थम रहे थे मन ने बस चाह की समय रूक जाए यही मैं फिर से बच्ची बन जाऊ पर बच्चे मुझे यु देखकर हैरान थे .५ साल से होस्टल में रहने वाला बेटा बोला माँ आप बड़ी मम्मी को देख आज २४ साल बाद ही इतनी भावुक हो रही हो जब शादी होकर आई थी तब क्या हाल रहा होगा ...अब कोई कैसे बताये माँ - बेटी के रिश्ते मैं उम्र या सालो बाद मिलना मायने नही रखता ... ढेर साडी बाते की माँ के साथ पापा के साथ .. मेरी लिखी कविताये पढ़ी उन्होंने पर माँ बोली मेरे घर आने वाली अखबार में छपनी चाहिए तेरी लिखी कोई कहानी या कविता ...तो अब जीजू anil royal ji माँ की यह इच्छा पूरी करनी हैं .चलते चलते पापा Malik rajkumar ji का लिखा उपन्यास बाईपास ले गये और खुश भी हुए यह तो अपने पासे का बंदा हैं ..... माँ का लाया सूट और मुठ्ही में पकडाया हुआ  ५०० का नोट मेरी जिन्दगी की सबसे कीमती धरोहर हैं  स्नेह से भीगा यह नोट  ..................

माँ ऐसे ही होती हैं न ............. हाँ मेरी माँ ऐसे ही हैं .पर जाते जाते न जाने ऐसा क्यों कह गयीं के मेरी जिन्दगी थोड़ी हैं अब ..एक बार आ जा कुछ दिन को साथ रहने .......और दिल किया माँ का हाथ पकड़ कर मैं भी बैठ जाऊ इन्नोवा में .पर धियान जम्देयाँ हों परायियाँ ..... ........फिर माँ ने मेरे आँसू देख खुद ही कहा अच्छा अब उदास मत हो जल्दी आऊंगी मैं वापिस ...............

मैंने हाथ थाम कर कहा.....कही नही जाना तुमने समझी ना जब तक मेरे दोनों बेटो के बच्चो की बड़ी वाली मम्मी नही बन जाती ....माँ भोली सी हंसी हंस दी ......... और मैं .................. खोयी हूँ माँ की यादो में ........

Monday, August 12, 2013

क्यों बेच रही हो ? कबाड़ी को

"मम्मा!!! क्या है आपको
?क्यों बेच रही हो ? कबाड़ी को मेरे रबड़ , शार्पनर और यह बैटमैन वाले कार्ड्स पता हैं कितनी मुश्किल से मिले थे ...और यह मेरे कॉमिक्स हाय यह स्टोरी बुक्स भी रस्किन बांड का पूरा कलेक्शन इकठ्ठा करने में मैंने कितनी बार दोस्तों के साथ बाहर बंद टिक्की मिस की ,और यह मेरी सारी खिलौना कार रखो न इनसबको वापिस उसी दादी वाले लोहे के बॉक्स में ."
बेटे की सब चीजे वापिस सहेजते हुए सोचने लगी मैं .......कि क्या मैं अपनेसामान को फेंक पाई हूँ वोह टूटा हुआ फूलदान वोह चूड़ियाँ जिन्हें बरसो से नही पहना , शादी वाले सूट , सहेलियों के दिए तोहफे . अपने हाथ से कढ़ाई किये पर अब पुराने हो चुके मेजपोश
पर सामने से हँसते हुए कहा "अच्छा बाबा रख देती हूँ सारा सामान .जब तुम्हारे बच्चे होंगे न और तुम उनको कुछ ला कर देने से मना करोगे तो तब उनको दीखाऊंगी कि कितना शैतान था तुम्हारा पापा ..अब तो खुश ना ."..
"जा कबाड़ी को बोल कल आना .पापा की अलमारी कल खोलेंगे " — feeling amused.

Sunday, August 11, 2013

सोच की परिधि

कितना भी सोचु कि अभी नही सोचूंगी पर सोचे फिर भी बार बार तुम्हे ही सोचती हैं और
सोच की परिधि से बाहर जाकर तुम " मैं" बन जाते हो और मैं खुद को भूल जाती हूँ .ये मन भी कितना बावला होता है न जिसको सोचना नही चाहिए वही सोचता हैं और जिन बातो को हमेशा अपनेदिमाग में रखना चाहिए वोह याद नही रखता हम हमेशा दायरों में रहकर अपनी सोचो को संकुचित रखते हैं तो तो भी सोचे बगावत कर जाती हैं . यह सोचे ही कभी हमें आसमान की अनंत उडान तो कभी रसातल की तरफ ले जाती हैं .सोचना इंसानी फितरत हैं इसलिय मैं भी सोचती हूँ बहुत कुछ ......हाँ बहुत कुछ ...पर आजतक मन का पक्षी अपनी उडान नही भर पाया .आज तक सोचे धरातल पर नही उतरी .आज तक त्रिशंकु की मानिद अटकी हैं .... नही सोच पाती मैं" तुम" बनकर और तुम बन' ना कोई आसान थोड़े हैं तुम तुम हो इसिलिय मैं सिर्फ मैं ही रह गयी हूँ सोचो में तुमको सोचते हुए अपने मन के कोने से ...........नीलिमा

Thursday, August 8, 2013

ईद मुबारक आपको .तीज मुबारक मुझको

 जानते भी हो कल क्या हैं !!! ईद हैं ईद ! आपका  जन्मदिन  इसी दिन हुआ था न  बाबा आपको  इदू कहकर पुकारते थे    माना कि हम हिन्दू हैं  पर इस दिन सेवइयां तो जरुर बनती हैं हमारे यहाँ .आ जाओ न  जल्दी से 
 और हाँ कल तीज भी हैं  , यह भी हमारे यहाँ नही मनाई जाती हैं पर मुझे हर साल  चूड़ियाँ तो दिलाते हो न आप और मेरे हाथो में मेहंदी भी  रचती हैं  ... ले आई हूँ मैं बाजार से चूड़ियाँ।।हाँ!  धानी रंग की ही  और मेहंदी का कोन भी .और सामने रखे सोच रही हूँ  तुम तो नही आओगे तो क्या फायदा मेहंदी का चूडियों का ..... रख देती हूँ अलमारी मैं .......जब तुम आऊगे न उसी दिन  सेवइयां भी बना लूंगी  और चूडियाँ भी पहन लूंगी मेहंदी लगाकर .......... अब नौकरी करनी हैं आपको तो क्या  मेरे नखरे , मेरे त्यौहार ( सरकार के खाते में भावनाओ की कदर नही )  जाओ कराओ अपने ऑफिस का निरीक्षण अपने  अधिकारियो  से :((
ईद मुबारक आपको .तीज मुबारक मुझको 

Tuesday, July 9, 2013

बूढ़ा मरता क्यों नी !!!

रिश्ते  कितने मुश्किल होते हैं आजकल . एक जमाना था सबसे आसान  रिश्ता था  माँ- बाप का बच्चो से  और बच्चो का माँ- बाप से  ,उसके बाद  भाई और बहन का   उस बाद के  सारे रिश्ते दुरुहता लिय हुए होते थे  परन्तु आज यह रिश्ता  जो सबसे प्यारा था आज भोतिकता वाद की भेँट  चदता जा रहा हैं . आज बच्चो के लिय उस उम्र तक ही माता  पिता सहनीय होते हैं  जब तक उनका अपना परिवार न बन जाए  , माता पिता  का बनाया ८ कमरों का मकान  और एक वक़्त ऐसा भी उनके लिय एक कमरा   भी मयस्सर नही होता  , माना  समाज में परिवर्तन होते हैं  परन्तु रिश्तो में  जो  खोखलापन या  रुपयावाद  हावी हो गया हैं  उसने आज समाज में   बुजुर्गो की स्तिथि बहुत दयनीय बना दी हैं  , माना कि  कुछ बुजुर्ग  इस उम्र में असहिष्णु   हो जाते हैं परन्तु उनके बच्चे भूल जाते हैं कि  आज उन में  जो जज्बा हैं यह इन्ही की बदोलत हैं  पश्चिम उत्तर प्रदेश की अखबारे अगर आप कभी पढ़े तो उसमे  सबसे ज्यादा खबरे व्यभिचार और दुसरे नम्बर पर बुजुर्गो पर अ त्याचार की होती हैं  . एक बीघा जमीन के लिय पिता को फावड़े से मार  देना ,  जमीन के कागजो पर  माता पिता  को म्रृत घोषित कर देना आम सी बात हो गयी हैं .इंसान जितनी मर्ज़ी लम्बी कार लेकर घूम रहा हैं उतनी ही छोटी अपनी सोच कर रहा हैं  आज के लोग   गर्व करते हैं कि  हमने अपने एक्लोते बच्चे को विदेश भेज कर पदाई करा दी  हमने फलां जगह भंडारा करा दिया  परन्तु घर में उनके बुजुर्गो ने अगर कभी अपनी पसंद की सब्जी केलिए  कह दिया तो घर भर में क्लेश हो जाना लाजिमी हैं  . कहने को पश्चिमी उत्तर प्रदेश    व्यापार  की दृष्टि से उन्नति कर रहा हैं सबसे ज्यादा आयकर इसी एरिया से जमा होता हैं सरकार को  परन्तु सबसे ज्यादा सामाजिक मूल्यों का हनन भी यही पर ही होता  हैं  सबसे  बड़ी बात यह हैं कि   घर भर में अपमान प्रताड़ना  और कही कही मार  पीट सहते हुए बुजुर्ग भी उस दायरे से बाहर नही आना चाहते   यह सोच कर कि  उनके पास अब जिन्दगी के बचे ही कितने दिन हैं , मैं तो कहती हूँ कि क्यों दिखाते हो ताजमहल विदेशियों को ....उनको कहो  कि  आकर के देखो यहाँ के बुजुर्गो को जिनके बच्चे भी उनको  जीने के लिय ओल्ड ऐज होम नही भेजना चाहते  परन्तु जीते जी जीने भी नही देना चाहते उनको दीखाना चाहिए कि  यह होती हैं सहन शीलता . काश यहाँ भी  विदेशो की तरह पुलिस होती जो एक काल भर से आ जाती 

 क्या कोई संस्था  हैं ऐसे जो इस पर पहल करे ...क्या कोई कानून हैं ऐसा जो ऐसे बुजुर्गो की अंतिम सांसे उनको सिसकते हुए न लेने दे  . सब सस्थाए भी  यही कहती हैं  कि  अगर लिखित में  शिकायत दर्ज हो  तभी कार्यवाही होगो .पर बुजुर्ग अगर लिखित में दे भी दे तो उनके बच्चे मनी के रसूख पर  मामला ही उल्टा देते हैं और पुलिस वाले ( काश यहाँ भी  विदेशो की तरह पुलिस होती जो एक काल भर से आ जाती )भी कह देते हैं ......." ओ ताऊ तेरे से  ताई संग घरे न बैठा  जाता एब आराम से  यो तेरे चुप चाप दो जून रोटी खाने के दिन .और तुझे  बच्चो की आजादी खल री  .जा आराम से बैठ घर जा के . वरना  कोई अर्थी को कन्धा भी न देगा लावारिस मर जाएगा " और वोह  बुजुर्ग  अपने अगले जन्म की खातिर उस बेटे के कंधे पर अर्थी मैं जाने की baat जोहता हैं जो उसकी जमीन जायदाद को उस सेमार पीट कर  छीन लेता हैं  और रोटी के एक एक टुकड़े को तरसा देता हैं   और माँ- बाप के मरने के बाद पूरी बिरादरी में कम्बल बाँट'ता  हैं  भोज का आयोजन करता हैं कि पिता जी को बड़ा किया था सुख से उम्र बीता के गये  हमारे बाबा जी / अम्मा जी ........... 

Tuesday, July 2, 2013

बच्चा हो बस एक , रिश्तो को न लगे सेंक .

क्या कहूँ ?अब तो थक गयी हूँ मैं . जिस घर से ब्याही जाती हैं लडकिया डोली उठ ते ही घर पराया हो जाता हैं और जिस घर पहुँचती हैं डोली वहां जाते ही कह दिया जाता हैं अपने घर से क्या लायी ? एक नारी की बिसात क्या हैं बस शतरंज का खेल हैं सब अपनी अपनी चाले चलते हैं कभी इधर वाले जीत जाते हैं कभी उधर वाले . पर दोनों ही नारी को उधर वाली समझते हैं अपने पाले की नही , सारा दिन मरती खपती हूँ तो घर का सारा इंतजाम सही से चलता हैं एक दिन की छुट्टी भी नही मिलती मायके वाले जब तब अपना रोना रोते रहते हैं कि तुम तो सही से रह रही हो अपने घर में यहाँ तुम्हारे बूढ़े माँ- बाबा को हम देखे न कही आने के ना जाने के , अब कोई पूछे जब बाबा का मकान जमीन कब्जाई तो पुछा था मुझसे .कि तुमने कैसे बच्चो की फीस का इंतजाम किया इधर सब कह देते हैं बड़े बाप की बेटी हैं ५ ० ० रूपये भी यु देते हैं जैसे अहसान कर रहे हो , लडकियों का भी हक हैं कि नही जमीन जायदाद में . अब किदर की सोचे . मैं न इधर कुछ कह सकू न उधर , एक बार भाई के सामने यूँ ही कह दिया था कि बाबा का ख्याल कर ......... यूँ गाली गलोज न किया करो बस उस पर पैसे का नशा ऐसे सर चढ़ कर बोलता हैं जैसे देसी दारू हो ......बस एक दम से कह दिया जा तेरे से सारे रिश्ते नाते ख़तम न तुम अब से हमारी न हम तेरे कुछ ....अब डर लगने लगा तब से कल मेरे बेटे की शादी होगी मामा नही आया तो सब कह देंगे लो बड़े बाप का बेटा हैं आया नही ............. सौ बात मुझे सुन ने को मिल जाएगी अब आदमी भी तब तक अपने होवे जब तक सब उनके मुताबिक हो \ जरा भी -इधेर उधर हो जाये तो जूते मरने को दौड़ते हैं कुछ तो अप्सरा जैसे बीबी के भी माँ- बाप भी ऐसे गाली सुना लेते हैं कि हम ओरत जात की आँखे पानी पानी हो जाए
यह बात सिर्फ हमारे तबके की नही पढ़े लिखे लोगो में भी भाई भाभी आजकल कितना पूछते हैं यह भाभियाँ भी अपने मायके की उतनी ही सताई होती हैं फिर भी जब बात रिश्तो की आती हैं एक अजीब सी खुमारी चड़ जाती हैं सब पर अपने कुछ होने की ....... अब थक गयी हूँ आज मायके से फिर भाई का संदेसा आया हैं या तो बाबा से सारी जमीन के कागज पर दस्तखत करा दे या फिर तेरा मेरा रिश्ता ख़तम .अब आप ही बताओ क्या करू ............? माँ- बाबा ने कोण सा मेरी सुध ली कभी ? बस ब्याह कर दिया और कह दिया अब तेरी किस्मत और तेरे सुख दुःख तेरे हाथ की लकीरे ....... मैं कहाँ हूँ / अछहा हुआ न मेरी एक ही ओलाद हैं अब जायदाद में किसी से झगडा नही करेगा अब तो सरकार को कहना चाहिए बच्चा हो बस एक , रिश्तो को न लगे सेंक .

आज सुबह काम वाली किरण के रोते हुए दिल की बयानी
 

Saturday, June 15, 2013

पापा

पापा  
 जितनी बाते  तुमसे लिख कर करती हूँ  उतनी कभी सामने खड़ी  होकर नही कर पाती हूँ  आपने इतने कड़े अनुशासन से हम सबको पाल पोस कर बड़ा किया  की आज भी हम जब कोई काम करने लगते हैं तो एक ख्याल जहन  में उभर आता हैं की आपको बुरा तो नही लगेगा  फिर याद karte kei उफ़ अब हम अपने घर में हैं   आपका हमें डांटना कि बिना दुपट्टे के घर से बाहर नही जाना  , कॉलेज से सीधे घर आना , पैसे का हिसाब रखा करो  जब आज याद आता हैं तो ना जाने कितनी बाते कभी मुसकराहट  लेकर मेरे जहन  में उभर आती है तो कभी आंसुओ की झड़ी लग जाती हैं 
                                                                   पापा आज आप उम्र के आखिरी पड़ाव पर हो  ८२  साल की उम्र में आप बहुत एक्टिव हो  , पर उम्र के साथ साथ आप जिद्दी बहुत हो गये हो  आप नही जानते अब आपकी जिद के मायने बदल गये हैं आप घर सिर्फ आपका नही  .नयी generations
भी हैं जिन्हें अपनी शर्तो पर जीना आता हैं  आप अब थोडा सा अपना अफसरी रुआब छोड़ कर एक दादू नानू  की तरह  जियो न आप हमारे बच्चो से इतना प्यार करते हो परतु हमारे लिय उतना प्यार क्यों नही प्रदर्शित करते हो  शायद आप उस पीढ़ी से हो जहाँ पिता अपनी संतान से अपने मत पिता के सामने प्यार का प्रदर्शन नही करते थे और आपने इस बात को कही गहरे तक आत्म सात कर लिया  और मन में ढेर सारा प्यार होते हुए भी उसे लफ्जों में बयां कर पाना आपके लिय नामुमकिन हो जाता हैं ...
 जानती हूँ पिछली बार जब मेरी तबियत ख़राब हुयी थी तो आप कितना घबरा गये थे आपका बस एक ही वाक्य था  तुम ठीक तो हो न .तुम्हारी  माँ  को भेजू क्या तुम्हारे पास  . ... . बस आपका इतना कह देना ही मेरे लिय काफी हो गया था 
 आज जब अपने बच्चो को पापा के साथ मस्ती करते देखती हूँ सब छोटी बड़ी बाते शेयर करते देखती हूँ तो कभी कभी मन उदास हो जाता हैं तब यह मुझे समझाते हैं की तुम्हारे पापा  ने आज तुम सबको -भाई  बहनों को जो दिया उसकी कदर करो जो नही दे पाये उसका मलाल नही . हर पिता अपनी संतान के लिय सर्वश्रेष्ट  करता हैं  आज हम भी parents हैं हम अपनी तरफ से बेस्ट karte हैं क्या पता कल हमारे बच्चे भी हमें कहे कि  आपने यह नही किया था यह क्यों किया था . उनके  दिल को पढो .जरुरी नही हर कोई अपने प्यार को स्नेह को लफ्जों में कह पाए  उनकी भावनाए बहुत अच्छी रही हैं

       अब वक़्त नही  मिलता की पहले की तरह आपके आस पास रहे  आपको छोटे छोटे फुल्के बनाकर खिलाये   फिर भी जब जब घर में बेसन की सब्जी बनती हैं या पकोड़े बनते हैं आपकी याद आती हैं 
                                                    जानती हु आज आप बेटे बहुओ  पोते पोतियों से घिरे हुए  होगे और सब बारी बारी से भापा जी  हैप्पी फादर  डे  कह रहे होंगे बस आप महसूस कर लेना एक आवाज़ मेरी भी है .......... 

 इश्वर से बस यही पार्थना करती हूँ  के आप जब तक जिए सबकी ख़ुशी का कारण  बने रहे , आत्मसम्मान के साथ जिए  उसी शान से जिए जिसके आप आदि रहे हैं  मेरे और बच्चो की तरफ से आपको ढेर सारा प्यार  

Saturday, May 11, 2013

आज माँ-दिवस हैं !!!


माँ!!! 
 तुम्हे तो पता भी नही होगा आज माँ-दिवस हैं  .जब सुबह बहुए आकर पैर छू  कर कहेगी मम्मी  हैप्पी मदर डे  तब तुम मुस्स्कुराकर कहोगी  तुम को   भी ... माँ हमारे ज़माने कहा होता था यह दिन ? आज तुम गिफ्ट लेकर जब बच्चो सी खुश होती हो और  हमें फ़ोन पर बताती हो के इस बार मुझे मदर डे पर गिफ्ट मिले तो लगता हैं जैसे कोई बचपन चहक रहा हैं  
                                                                    जानती हो तुमको बहुत मिस करती हूँ .जब जब किचन में खाना बनती हूँ  तो मेवी  कहता हैं माँ आप अच्छा  खाना बनाती हो पर बड़ी मम्मी जैसा नही  . मेरे  मेवी एक दिन को ही क्यों ना जाए तुम्हारे हाथ के आलू के पराठे खाना नही भूलता  और खासकर जब तुम घी में भिगोकर उन पराठो का पहला कौर अपने हाथ से उसको खिलाती हो  घर आकर न जाने कितने दिनों तक उसका यही राग चलता हैं की बड़ी माँ यह करती बड़ी माँ वोह करती हैं .....सारा दिन मेरे पास बैठ कर पूछता हैंकी जब आप छोटी थी तो बड़ी माँ कैसी  थी क्या करती थी कैसे करती थी ?  मसाले वाले बैंगन हो या  बेसन की सब्जी ......लस्सी हो या साग .....पता नही क्या जादू होता था तुम्हारे हाथो में कि  बिना लहसुन प्याज का खाना भी आज के बड़े बड़े शेफ्स  को मात कर दे ...


 तुम कैसे कर जाती थी इतना काम .हम ७ भाई - बहन .सबके सब एक से बढ़कर एक शैतान  पर तुम्हारा अनुशासन ........ एक ही सब्जी बनेगी और हम सब भाई बहन बिना आवाज़ किये तब लौकी तो री टिंडे खा जाते थे कोई नखरा नही  और आज घर में तीन लोग हैं  और सब्जी चार तरह की बनती हैं ...फिर भी हमारे बच्चे उतना ग्लो नही करते जितना हम करते थे उस ज़माने में 
 कल मैंने मेवी को डांट दिया कि  कितना परेशान कर रखा बच्चो ने .जरा भी चैन नही तो थोड़ी देर बाद मेरे पास आ  कर  बोल पढ़ा कि बड़ी माँ वास ग्रेट  आप जैसे ७ बच्चे पाल  दिए और आज भी हैप्पी हैं  एक आप से हमारे जैसे २ बेटे नही सम्हाले जा रहे ....अगर ज्यादा परेशान हो तो बड़ी माँ को बुला लो कुछ दिन के लिय ... 

   एक बात बताओ माँ .पापा ने इतना पैसा कमाया पर तुमने कभी देखावा नही किया सिंपल सा खाना सिंपल से कपडे पहन ने   ........कभी किसी चीज से ज्यादा लगाव नही बस हाँ जानती हूँ तुमको घूमने का बड़ा शौंक था धार्मिक पर्यटन  का पापा के साथ अगर कही धार्मिक  पर्यटन पर जाना होता तो आप भूल जाती की मेरे एग्जाम चल रहे हैं बड़ी बहने  घर सम्हाल लेती थी और आप गंगा सागर बद्री नाथ केदार नाथ  न जाने कहा घूम आती  थी  मैं गुस्सा होती तो कहती की मैं जानती हूँ तुम पढ़ लोगी खुद ही पता नही बुदापे में इस लायक रहे भी या नही .अभी जितना भगवन जी से मिलना हो मिल आओ फिर तो उनको ही बुलावा देते रहना होगा कि कब मिलने आओगे ? 

सच में आज भी तुम जैसे पूजा नही कर पाती तुम्हारा फरमान कि  अगर नहाना नही सुबह तो नाश्ता नही मिलेगा .कई बार जिद में मैं  नाश्ता नही करती  मुझसे सुबह सुबह नही नहाया जाता .आप भी अपने वचन की पक्की थी मुझे सीधा लंच ही मिलता था नहाने के बाद  .आज जब केवी मेवी को सु बह उठ ते ही नहाने को कहती हूँ तो अपने को जैसे आईने के सामने पाती हूँ 


 आप का डांटना कि  सब काम सीखो .......ना जाने कैसे घर में विवाह हो  और पूरा घर अपने बल पर  सम्हालना पड़े  काम अच्छे लगते हैं चाम नही  जिस घर में जा ओगी लोग चार दिन चाम ( स्किन  ) देखेंगे उसके बाद काम ही परखेंगे  ....


 माँ आज मन करता हैं तुम्हारे पास आकर कुछ दिन रहू  पर क्या करू कुछ मेरी मजबुरिया घर परिवार  और कुछ अब तुम्हारे घर का बदला हुआ सा वातावरण ..भाई भाभिया  और तुम अब उनकी जैसे ज्यादा हो गयी हो .   अब कैसे  रह सकती हूँ  ....मेरा मन ही नही लगता . फिर तुम गुस्सा करती हो कि के बिगड़ गयी हो ससुराल जाकर ....स्वतंत्र ने सर पर चढ़ा  कर रखा हुआ हैं तुझे !! तब सब जोर से हस देते हैं पर मेरी आँखे अन्दर तक भीग जाती हैं .
                                     जानती हो तब तुमसे कितनी बहस करती थी मैं हर बात पर  .और अगर आज मुझे कोई तुम्हारी जरा सी भी शिकायत करता हैं तो मुझे बहुत जोर से गुस्सा आता हैं 
.माँ अब तुम आखिरी पायदान पर हो उम्र की सब ऐसे क्यों कहते हैं  मैं तो चाहती हूँ के तुम उम्र भर मेरे सर पर चांदनी से बिखरीरहो जरा भी परेशानी हो  जरा भी ख़ुशी हो झट से तुम्हारा नंबर मिलाउ और बात कर लू 

 पता हैं कल रात मेवी बोला कि माँ आपको नींद नही आरही ना तो अपने तकिये पर अपनी माँ का नाम लिखो अच्छे से नींद आएगी .और मैंने उसका मान रखने को तुम्हारा नाम लिखा " " विद्या ""   और सच मानो कल रात  इतने सुकून की नींद आई 
 जैसे तुम मुझे थपकी देकर सुला रही हो 


माँ खुश रहा करो इतने सारे नाती पोते ../ पोतिया हैं न चारो तरफ जो तुम्हे तुम्हारे बच्चो से भी ज्यादा प्यार करते हैं .बड़ा अच्चा लगता हैं बच्चो के संग तुमको ठहाके लगते हुए देखना 

 और हाँ अबकी बार मैं जब आऊंगी ना .मुझे बेसन  की सब्जी खानी हैं तुम्हारे हाथ की और.आलू बड़ी की सब्जी ........

 इंतज़ार कर रही हो ना ...कभी आज तक शब्दों में तो नही कहा ....... पर यहाँ लिख रही हूँ ..माँ मुझे तुम से बहुत प्यार हैं मुझे मेरी गलतियों के लिय क्षमा करना जो बचपने में अक्सर कर जाती थी आज खुद माँ बनकर आपकी भावनाए ज्यादा अच्छे से समझ पा रही हूँ    
 बस इश्वर तुमको अच्छी  और सुकून भरी जिन्द्दगी दे जब तक जीना  स्वाभिमान से जीना ... आपका साया हमें हमेशा प्यार देता रहे 

Monday, April 29, 2013

ओये तू कब बड़ा होगा ?

सुबह सुबह उठो बेटे के लिय टिफ़िन बनाओ जब तक स्कूल न चला जाए उसके चारो तरफ घुमते रहो कि मम्मा रुमाल कहा गया? आज यह वाला बैग नही ले जाना , अरेय मेरी इंग्लिश की बुक कहा गयी यहाँ ही तो रखी थी मम्मा जाओ न गेट का लॉक तो खोलो जल्दी से और मेरी साइकिल भी गेट के पास तक ले आओ जरा प्लीज़ !!!
कभी कभी बड़ी खीझ सी होती हैं की इत्ता बड़ा हो गया फिर भी मम्मा को लॉकेट बनाकर हर वक़्त गले में लटकाए रखना चाहता हैं बस आज सुबह मैंने भी धमकी दे दी कि मैं तो जा रही हूँ कुछ दिन
के लिय दिल्ली ,तुम्हारे पास अब बुआ रहेगी कुछ दिन ......


अभी बेटे के जाने के बाद चाय का मग लेकर जैसे ही कमरे में आई तो लंच बॉक्स और ढूध का गिलास वैसे ही उसकी टेबल पर रखे हैं . साथ में एक चिट भी " बुआ को कोई फर्क नही पड़ेगा " मेवी " ने स्कूल लंच में क्या खाया क्या नही बस एक बार डांट देगी के लंच बॉक्स क्यों नही ले गया , पर मेरी माँ आज नाश्ता नही करेगी कि मेवी आज स्कूल में भूखा होगा सो ..आज के बाद मत कहना के मैं दिल्ली जा रही हूँ तुम तंग करते हो तुमको तंग न करू तो किसको करू .. ऐसे तो आप बोर हो जाऊगी जा ओगी और जल्दी से बूढ़ी भी .और मुझे हमेशा ऐसे ही मम्मी चाहिए जो मुझे डांट भी दे पर मेरी इंग्लिश बुक भी ढूढ़ कर दे जो मुझे सामने पढ़ी होने पर भी नही दिखती ......समझी मेरी माँ ........ अब यह नाश्ता आप खा लेना .आज मानसी का जन्मदिन हैं अभी उसका व्हात्ट्स उप आया हैं कि सब दोस्तों का लंच लेकर आएगी वोह "

अब क्या कहूँ मैं .नाश्ता खा रही हूँ लंच बॉक्स में से और सोच रही हूँ कि सच में बच्चे न हो तो जीवन में रस ही न रहे .. अगले साल जब यह होस्टल जायेगा तो कोई मुझे आवाज़ नही लगाएगा के मेरी बुक कहा गयी ???????
पर देखो न कैसे बिस्तर पर टोवल और कपडे फैला कर गया हैं ..... चलिय शुरू करते हैं अपना दिन


आप सबको भी नोंक- झोंक से भरा प्यारा सा अप्रैल का आखिरी दिन शुभ हो 

Thursday, April 18, 2013

" गर्मी की छुट्टी और माँ


 पीछे मुढ कर देखती हूँ तो याद आती हैं माँ  और मेरी गर्मी की छुट्टिया 
.जमाना अलग था  ..... उन दिनों छुट्टी का मतलब था घर सम्हालना  ..  किताबो से परहेज करना  मैं ठहरी किताबी कीड़ा  .कैसे रह सकती थी किताबो के बिना ..... मेरी सुबह अखबार के साथ होती और शाम  होती किसी न किसी नोवल संग .मांग कर पढना तब कभी बुरा नहीं माना  जाता था , जब भी किसी मित्र रिश्तेदार के यहाँ कोई किताब देख जाती झट से पढने के लिय मांग लिया करते थे  और ना  सुन ने पर बुरा भी लगता था . अब माँ तो माँ होती हैं उनको लगता की उनकी  जिद्दी सी  बेटी किताबे ही पढ़ती रहेगी तो ससुराल मैं क्या करेगी  और हमारा एक ही जवाब होता  ....... हमें कोन सा शादी करनी हैं  हम तो पढ़ेंगे  और नौकरी करेंगे  ... माँ कहती पढना  या नौकरी करना अलग होता हैं  पर घर का काम  हर लड़की को आना चाहिए   चाहे वोह खाना पकाना हो या फटे कपडे  सिलना /करीने से लगाना  . हम सोचते ही रहते  की इस बार यह होगा गर्मियों में . नानी के घर जायेंगे  बुआ के घर जायेंगे  
 पर ..........दिल के अरमान आंसुओ मैं बह गये  .......... और हमें दाखिला दिलाया गया   सिलाई कढ़ाई   की कक्षा में .पाजामा   
 सिलने से शुरुवात हुयी और  जल्दी हमने फ्रॉक सलवार कमीज और थैली वाली कट से पजामी सिलना सीख लिया  अब तो हमें भी मजा आने लगा इनसब में .और अब हम दो दिन में कुछ भी नया सिलकर फिर माँ के सामने जा खड़े होते कि  माँ बाजार से नया कपडा लाना हैं ....अब हर दो- तीन बाद नया कपडा कहा से लाती माँ  ...... हमने सोचा क चलो अब हमारी छुट्टी होगी यहाँ से  और हम फिर से सारी  दोपहर 'शिवानी " के नोवेल्स पढेंगे  .कब से " किस्श्नुली " पूरा नही हो रहा हैं  
 पर कहते हैं माँ तो माँ होती हैं ......माँ ने ताई जी और चाची जी  से कहा कि  जिसने जो सिलाना हो  नीलिमा सिलाई सीख रही हैं  इसको कपडा दे दो  .......बस जी होना क्या था .हम अकेले और हमारे पास थैला भर कपडे  दो दिन में इकठ्ठे हो गये  .... हम माँ की तरफ कातर  दृष्टि से देख रहे थे और माँ विजयी भाव से ............ इस तरह उन छुट्टियों में सीखी सिलाई हमें आज भी याद आती हैं जब हम अपने सूट काटकर उनसे कुशन बनाते हैं ................

Thursday, February 28, 2013

राष्ट्र हित में आप भी जुड़िये इस मुहीम से -


राष्ट्र हित में आप भी जुड़िये इस मुहीम से -
सन 1945 मे नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की तथाकथित हवाई दुर्घटना या उनके जापानी सरकार के सहयोग से 1945 के बाद सोवियत रूस मे शरण लेने या बाद मे भारत मे उनके होने के बारे मे हमेशा ही सरकार की ओर से गोलमोल जवाब दिया गया है उन से जुड़ी हुई हर जानकारी को "राष्ट्र हित" का हवाला देते हुये हमेशा ही दबाया गया है ... 'मिशन नेताजी' और इस से जुड़े हुये मशहूर पत्रकार श्री अनुज धर ने काफी बार सरकार से अनुरोध किया है कि तथ्यो को सार्वजनिक किया जाये ताकि भारत की जनता भी अपने महान नेता के बारे मे जान सके पर हर बार उन को निराशा ही हाथ आई !
मेरा आप से एक अनुरोध है कि इस मुहिम का हिस्सा जरूर बनें ... भारत के नागरिक के रूप मे अपने देश के इतिहास को जानने का हक़ आपका भी है ... जानिए कैसे और क्यूँ एक महान नेता को चुपचाप गुमनामी के अंधेरे मे चला जाना पड़ा... जानिए कौन कौन था इस साजिश के पीछे ... ऐसे कौन से कारण थे जो इतनी बड़ी साजिश रची गई न केवल नेता जी के खिलाफ बल्कि भारत की जनता के भी खिलाफ ... ऐसे कौन कौन से "राष्ट्र हित" है जिन के कारण हम अपने नेता जी के बारे मे सच नहीं जान पाये आज तक ... जब कि सरकार को सत्य मालूम है ... क्यूँ तथ्यों को सार्वजनिक नहीं किया जाता ... जानिए आखिर क्या है सत्य .... अब जब अदालत ने भी एक समय सीमा देते हुये यह आदेश दिया है कि एक कमेटी द्वारा जल्द से जल्द इस की जांच करवा रिपोर्ट दी जाये तो अब देर किस लिए हो रही है ???
आप सब मित्रो से अनुरोध है कि यहाँ नीचे दिये गए लिंक पर जाएँ और इस मुहिम का हिस्सा बने और अपने मित्रो से भी अनुरोध करें कि वो भी इस जन चेतना का हिस्सा बने !
Set up a multi-disciplinary inquiry to crack Bhagwanji/Netaji mystery
यहाँ ऊपर दिये गए लिंक मे उल्लेख किए गए पेटीशन का हिन्दी अनुवाद दिया जा रहा है :-
सेवा में,
अखिलेश यादव,
माननीय मुख्यमंत्री
उत्तर प्रदेश सरकार
लखनऊ
प्रिय अखिलेश यादव जी,
इतिहास के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर, आप भारत के सबसे युवा मुख्यमंत्री इस स्थिति में हैं कि देश के सबसे पुराने और सबसे लंबे समय तक चल रहे राजनीतिक विवाद को व्यवस्थित करने की पहल कर सकें| इसलिए देश के युवा अब बहुत आशा से आपकी तरफ देखते हैं कि आप माननीय उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के हाल ही के निर्देश के दृश्य में, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भाग्य की इस बड़ी पहेली को सुलझाने में आगे बढ़ेंगे|
जबकि आज हर भारतीय ने नेताजी के आसपास के विवाद के बारे में सुना है, बहुत कम लोग जानते हैं कि तीन सबसे मौजूदा सिद्धांतों के संभावित हल वास्तव में उत्तर प्रदेश में केंद्रित है| संक्षेप में, नेताजी के साथ जो भी हुआ उसे समझाने के लिए हमारे सामने आज केवल तीन विकल्प हैं: या तो ताइवान में उनकी मृत्यु हो गई, या रूस या फिर फैजाबाद में | 1985 में जब एक रहस्यमय, अनदेखे संत “भगवनजी” के निधन की सूचना मिली, तब उनकी पहचान के बारे में विवाद फैजाबाद में उभर आया था, और जल्द ही पूरे देश भर की सुर्खियों में प्रमुख्यता से बन गया| यह कहा गया कि यह संत वास्तव में सुभाष चंद्र बोस थे। बाद में, जब स्थानीय पत्रकारिता ने जांच कर इस कोण को सही ठहराया, तब नेताजी की भतीजी ललिता बोस ने एक उचित जांच के लिए उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने उस संत के सामान को सुरक्षित रखने का अंतरिम आदेश दिया।
भगवनजी, जो अब गुमनामी बाबा के नाम से बेहतर जाने जाते है, एक पूर्ण वैरागी थे, जो नीमसार, अयोध्या, बस्ती और फैजाबाद में किराए के आवास पर रहते थे। वह दिन के उजाले में कभी एक कदम भी बाहर नहीं रखते थे,और अंदर भी अपने चयनित अनुयायियों के छोड़कर किसी को भी अपना चेहरा नहीं दिखाते थे। प्रारंभिक वर्षों में अधिक बोलते नहीं थे परन्तु उनकी गहरी आवाज और फर्राटेदार अंग्रेजी, बांग्ला और हिंदुस्तानी ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया, जिससे वह बचना चाहते थे। जिन लोगों ने उन्हें देखा उनका कहना है कि भगवनजी बुजुर्ग नेताजी की तरह लगते थे। वह अपने जर्मनी, जापान, लंदन में और यहां तक कि साइबेरियाई कैंप में अपने बिताए समय की बात करते थे जहां वे एक विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु की एक मनगढ़ंत कहानी "के बाद पहुँचे थे"। भगवनजी से मिलने वाले नियमित आगंतुकों में पूर्व क्रांतिकारी, प्रमुख नेता और आईएनए गुप्त सेवा कर्मी भी शामिल थे।
2005 में कलकत्ता उच्च न्यायालय के आदेश पर स्थापित जस्टिस एम.के. मुखर्जी आयोग की जांच की रिपोर्ट में पता चला कि सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु 1945 में ताइवान में नहीं हुई थी। सूचनाओं के मुताबिक वास्तव में उनके लापता होने के समय में वे सोवियत रूस की ओर बढ़ रहे थे।
31 जनवरी, 2013 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने ललिता बोस और उस घर के मालिक जहां भगवनजी फैजाबाद में रुके थे, की संयुक्त याचिका के बाद अपनी सरकार को भगवनजी की पहचान के लिए एक पैनल की नियुक्ति पर विचार करने का निर्देशन दिया।
जैसा कि यह पूरा मुद्दा राजनैतिक है और राज्य की गोपनीयता के दायरे में है, हम नहीं जानते कि गोपनीयता के प्रति जागरूक अधिकारियों द्वारा अदालत के फैसले के जवाब में कार्यवाही करने के लिए किस तरह आपको सूचित किया जाएगा। इस मामले में आपके समक्ष निर्णय किये जाने के लिए निम्नलिखित मोर्चों पर सवाल उठाया जा सकता है:
1. फैजाबाद डीएम कार्यालय में उपलब्ध 1985 पुलिस जांच रिपोर्ट के अनुसार भगवनजी नेताजी प्रतीत नहीं होते।
2. मुखर्जी आयोग की खोज के मुताबिक भगवनजी नेताजी नहीं थे।
3. भगवनजी के दातों का डीएनए नेताजी के परिवार के सदस्यों से प्राप्त डीएनए के साथ मेल नहीं खाता।
वास्तव मे, फैजाबाद एसएसपी पुलिस ने जांच में यह निष्कर्ष निकाला था, कि “जांच के बाद यह नहीं पता चला कि मृतक व्यक्ति कौन थे" जिसका सीधा अर्थ निकलता है कि पुलिस को भगवनजी की पहचान के बारे में कोई स्पष्ट संकेत नहीं मिला।
हम इस तथ्य पर भी आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं कि न्यायमूर्ति मुखर्जी आयोग की जांच की रिपोर्ट से यह निष्कर्ष निकला है कि "किसी भी ठोस सबूत के अभाव में यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि भगवनजी नेताजी थे"। दूसरे शब्दों में, आयोग ने स्वीकार किया कि नेताजी को भगवनजी से जोड़ने के सबूत थे, लेकिन ठोस नहीं थे।
आयोग को ठोस सबूत न मिलने का कारण यह है कि फैजाबाद से पाए गए भगवनजी के तथाकथित सात दातों का डी एन ए, नेताजी के परिवार के सदस्यों द्वारा उपलब्ध कराए गए रक्त के नमूनों के साथ मैच नहीं करता था। यह परिक्षण केन्द्रीय सरकार प्रयोगशालाओं में किए गए और आयोग की रिपोर्ट में केन्द्र सरकार के बारे मे अच्छा नहीं लिखा गया। बल्कि, यह माना जाता है कि इस मामले में एक फोरेंसिक धोखाधडी हुई थी।
महोदय, आपको एक उदाहरण देना चाहेंगे कि बंगाली अखबार "आनंदबाजार पत्रिका" ने दिसंबर 2003 में एक रिपोर्ट प्रकाशित कि कि भगवनजी ग्रहण दांत पर डीएनए परीक्षण नकारात्मक था। बाद में, "आनंदबाजार पत्रिका", जो शुरू से ताइवान एयर क्रेश थिओरी का पक्षधर रहा है, ने भारतीय प्रेस परिषद के समक्ष स्वीकार किया कि यह खबर एक "स्कूप" के आधार पर की गयी थी। लेकिन समस्या यह है कि दिसंबर 2003 में डीएनए परीक्षण भी ठीक से शुरू नहीं किया गया था। अन्य कारकों को ध्यान में ले कर यह एक आसानी से परिणाम निकलता है कि यह "स्कूप" पूर्वनिर्धारित था।
जाहिर है, भारतीय सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीश, एम.के. मुखर्जी ऐसी चालों के बारे में जानते थे और यही कारण है कि 2010 में सरकार के विशेषज्ञों द्वारा आयोजित डी एन ए और लिखावट के परिक्षण के निष्कर्षों की अनदेखी करके,उन्होंने एक बयान दिया था कि उन्हें "शत प्रतिशत यकीन है" कि भगवनजी वास्तव में नेताजी थे।यहाँ यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि सर्वोच्च हस्तलेख विशेषज्ञ श्री बी लाल कपूर ने साबित किया था कि भगवनजी की अंग्रेजी और बंगला लिखावट नेताजी की लिखावट से मेल खाती है।
भगवनजी कहा करते थे की कुछ साल एक साइबेरियाई केंप में बिताने के बाद 1949 में उन्होंने सोवियत रूस छोड़ दिया और उसके बाद गुप्त ऑपरेशनो में लगी हुई विश्व शक्तियों का मुकाबला करने में लगे रहे। उन्हें डर था कि यदि वह खुले में आयेंगे तो विश्व शक्तियां उनके पीछे पड़ जायेंगीं और भारतीय लोगो पर इसके दुष्प्रभाव पड़ेंगे। उन्होंने कहा था कि “मेरा बाहर आना भारत के हित में नहीं है”। उनकी धारणा थी कि भारतीय नेतृत्व के सहापराध के साथ उन्हें युद्ध अपराधी घोषित किया गया था और मित्र शक्तियां उन्हें उनकी 1949 की गतिविधियों के कारण अपना सबसे बड़ा शत्रु समझती थी।
भगवनजी ने यह भी दावा किया था कि जिस दिन 1947 में सत्ता के हस्तांतरण से संबंधित दस्तावेजों को सार्वजनिक किया जाएगा, उस दिन भारतीय जान जायेंगे कि उन्हें गुमनाम/छिपने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ा।
खासा दिलचस्प है कि , दिसम्बर 2012 में विदेश और राष्ट्रमंडल कार्यालय, लंदन, ने हम में से एक को बताया कि वह सत्ता हस्तांतरण के विषय में एक फ़ाइल रोके हुए है जो "धारा 27 (1) (क) सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम (अंतरराष्ट्रीय संबंधों) के तहत संवेदनशील बनी हुई है और इसका प्रकाशन संबंधित देशों के साथ हमारे संबंधों में समझौता कर सकता है" ।
महोदय, इस सारे विवरण का उद्देश्य सिर्फ इस मामले की संवेदनशीलता को आपके प्रकाश में लाना है। यह बात वैसी नहीं है जैसी कि पहली नजर में लगती है। इस याचिका के हस्ताक्षरकर्ता चाहते है कि सच्चाई को बाहर आना चाहिए। हमें पता होना चाहिए कि भगवनजी कौन थे। वह नेताजी थे या कोई "ठग" जैसा कि कुछ लोगों ने आरोप लगाया है? क्या वह वास्तव में 1955 में भारत आने से पहले रूस और चीन में थे, या नेताजी को रूस में ही मार दिया गया था जैसा कि बहुत लोगों का कहना है।
माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह और न्यायमूर्ति वीरेन्द्र कुमार दीक्षित, भगवनजी के तथ्यों के विषय में एक पूरी तरह से जांच के सुझाव से काफी प्रभावित है। इसलिए हमारा आपसे अनुरोध है कि आप अपने प्रशासन को अदालत के निर्णय का पालन करने हेतू आदेश दें। आपकी सरकार उच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में विशेषज्ञों और उच्च अधिकारियों की एक टीम को मिलाकर एक समिति की नियुक्ति करे जो गुमनामी बाबा उर्फ भगवनजी की पहचान के सम्बन्ध में जांच करे।
यह भी अनुरोध है कि आपकी सरकार द्वारा संस्थापित जांच -
1. बहु - अनुशासनात्मक होनी चाहिए, जिससे इसे देश के किसी भी कोने से किसी भी व्यक्ति को शपथ लेकर सूचना देने को वाध्य करने का अधिकार हो । और यह और किसी भी राज्य या केन्द्रीय सरकार के कार्यालय से सरकारी रिकॉर्ड की मांग कर सके।
2. सेवानिवृत्त पुलिस, आईबी, रॉ और राज्य खुफिया अधिकारी इसके सदस्य हो। सभी सेवारत और सेवानिवृत्त अधिकारियों, विशेष रूप से उन लोगों को, जो खुफिया विभाग से सम्बंधित है,उत्तर प्रदेश सरकार को गोपनीयता की शपथ से छूट दे ताकि वे स्वतंत्र रूप से सर्वोच्च राष्ट्रीय हितों के लिए अपदस्थ हो सकें।
3. इसके सदस्यों में नागरिक समाज के प्रतिनिधि और प्रख्यात पत्रकार हो ताकि पारदर्शिता और निष्पक्षता को सुनिश्चित किया जा सके। ये जांच 6 महीने में खत्म की जानी चाहिए।
4. केन्द्र और राज्य सरकारों द्वारा आयोजित नेताजी और भगवनजी के बारे में सभी गुप्त रिकॉर्ड मंगवाए जाने पर विचार करें। खुफिया एजेंसियों के रिकॉर्ड को भी शामिल करना चाहिए। उत्तर प्रदेश कार्यालयों में खुफिया ब्यूरो के पूर्ण रिकॉर्ड मंगावाये जाने चाहिए और किसी भी परिस्थिति में आईबी स्थानीय कार्यालयों को कागज का एक भी टुकड़ा नष्ट करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
5.सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भगवनजी की लिखावट और अन्य फोरेंसिक सामग्री को किसी प्रतिष्ठित अमेरिकन या ब्रिटिश प्रयोगशाला में भेजा जाये.
हमें पूरी उम्मीद है कि आप, मुख्यमंत्री और युवा नेता के तौर पर दुनिया भर में हम नेताजी के प्रसंशकों की इस इच्छा को अवश्य पूरा करेंगे |
सादर
आपका भवदीय
अनुज धर
लेखक "India's biggest cover-up"
चन्द्रचूर घोष
प्रमुख - www.subhaschandrabose.org और नेताजी के ऊपर आने वाली एक पुस्तक के लेखक
Thanks & Regards