Thursday, February 26, 2015

खामोश चीखे___ हरकीरत हीर


नीलिमा शर्मा Neelima Sharrma हमेशा से ही मेरी नज़्मों की प्रशंसिका रही हैं .... जब मेरी किताब ' खामोश चीखें ' उन्हें मिली तो तुरंत उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया समीक्षात्मक रूप में लिख भेजी … आज वो दैनिक पूर्वोदय में प्रकाशित हुई है … और ये पहली बार हुआ कि समीक्षा पढ़कर मुझे कई फोन आये और पुस्तक मँगवाने की इच्छा ज़ाहिर की ……नीलिमा जी आप जैसी प्रशंसिका का ह्रदय से आभार ....
नीलिमा जी आपका पता गलती से समीक्षा के साथ नहीं छपा है जबकि छपना चाहिए था । इसलिए आपका पता मैं यहाँ दे रही हूँ ....
नीलिमा शर्मा
M-407 , guru harkishan nagar
Paschim vihaar ,New delhi
आभार समाचार-पत्र के सह - संपादक रवि शंकर रवि जी Ravishankar Ravi
अगर समीक्षा पढ़ने में दिक्कत हो तो इसे आप रविशंकर रवि जी की वाल पर भी पढ़ सकते हैं .....सादर





"क्या कहा ...?
 ओउरत मर्द का आधा हिस्सा होती हैं ?
 बताना  तो ज़रा ...
 तुमने इस आधे  हिस्से  के बारे 
 जिन्दगी में 
 कितनी  बार सोचा.... "?"
                                           "हरकीरत हीर " एक ऐसा नाम  जो नज्मो का पर्याय  सा लगता हैं   जब उनका नज्म संग्रह खमोश चीखां"  पंजाबी में आया था तो बेहद अफ़सोस हुआ था कि मुझे गुरमुखी पढनी क्यों नही आती " पर शायद रब ने  उनके चाहने वालो की सुन ली  और आगमन प्रकाशन  ने उनकी इस पुस्तक को हिंदी में प्रकाशित  किया   ,  हीर जी  से  जब यह पुस्तक  जब मुझे बाय पोस्ट मिली  तो मेरी ख़ुशी का पारावार   ना था  | आज की अमृता  की किताब  मेरी प्रिय अमृता  प्रीतम की किताबो के समकक्ष  हैं और उनकी बुक के आते ही यह  फीलिंग्स   थी 
 हरकीरत जी के शब्द  मेरे मन की आवाज़ सी 
 " लगता हैं आज 
 सबसे अच्छा दिन  हैं 
 रब्ब  से भी अच्छा 
 आज शब्दों की जरुरत नही 
 पानी की भी नही 
 न रोटी की ना हवा की 
 आज किसी  चीज की भूख नही 
 आज तुम्हारे ख़त में लिखा 
हर एक अक्षर मेरा है 
 वक़्त मेरे साथ चले ना चले 
 मैं मोहब्बत के साथ चल पड़ीं हूँ "
 पन्ना दर पन्ना   कही लफ्ज़ मुझे मेरे अपने से लगते कही  मुझे  लगता  कही अमृता प्रीतम की रूह तो हीर जी में  नही आन बसी 
 रूह का तो मालूम नही पर ज़ज्बातो को महसुसू करने की शिद्दत जरुर एक सी हैं 
 एक एक नज्म  दिल की गहराई से लिखी हुयी   हैं उनके लिखी पञ्च- छः  लाइन्स  भी एक मुकम्मल नज्म बन जाती हैं  देखिये एक बानगी 
" नज्म रात 
 इश्क के कलीरे बांध 
धीमे धीमे 
 सीढियां उतर 
 तारो के घर की और 
चल पढ़ी 
 खौफ जदा  रात  अंगारों पर 
 पानी डालती रानी "
 एक और नज़्म देखिये   गागर में सागर भारती सी 
" कोई ठंडी हवा का झोंका 
 आधी रात मेरे लहू में 
अक्षर-अक्षर हो 
 लिख जाता हैं किताब 
 कभी तो आ-
 दिल के तहखानो तक 
 जिसकी टूटी सत्रे जोड़ 
 कोई नज्म बना सके "
इश्क मोह्बात  रिश्ते अकेलापन तन्हाई  कोई भाव ऐसा नही जिसपर हीर जी के मन  से भाव न उभरे हो और उन्हें नज्म की सूरत न मिली हो ..
 इमरोज़ जी का उनको अमृता कहना किसी मायने में अतिश्योक्ति नही 
 " यह  कैसे पत्थर हैं सिसकते हुए ?
कही मिटटी कांपी  हैं ......."/ 
" आ आज की रात तुझे 
आखिरी ख़त लिख दूँ 
 टूटी हुयी सिसकती जिन्दगी में 
 कौन जाने फिर कोई रात आये ना आये "
 प्रेम  पर  बहुत से लोग लिख रहे हैं परन्तु प्रेम की पराकाष्ठा  को महसूस करना फिर माकूल लफ्ज़ में  उन     को माला बनाकर  जीना हर किसी के वश में नही हैं  .खुदा कुछ ही लोगो को हुनर देता हैंऔर  हीर  जी की तरह  उनको महसूस करना उस पर और भी कठिन 
                                        किस किस नज्म की यहाँ तारीफ़ करू ... माँ पर लिखी हुयी हो या फिर  रब्ब से किये हुए उलाहने हो  वक़्त की लकीरे हो या चुन्नियाँ |
                                                            लफ्ज़  लफ्ज़ में एक सम्मोहकता  हैं  एक पल  को पढ़कर भूल जाने वाले अक्षर नही यह  अपितु मन के अंदरूनी कोने तक बैठ जाने वाले  भाव हैं जिसे  बरसो बरस जिया जाएगा भीतर अपना मान कर |   नज्म में शामिल बिम्ब बहुत खूबसूरत हैं कही भी उन्हें जबरन शामिल किया हुआ नही  लिया हुआ लगता 
 टंग दी हैं 
 बाकी की उम्र अब 
 फर्जो की किली पर 
 हंसी का ख्याल भी अब 
 दर्द को उलाहने देता हैं 
 ~~~~~~
 पता नही  कितने रिश्ते  बिखरे पड़े  हैं मेरी देह पर 
 फिर भी तलाश जारी हैं 
 एक ऐसे रिश्ते की 
  जो लापता हैं उस दिन से 
 जिस दिन  से तूने बाँधी  थी डोर 
  एक नए रिश्ते से 
 और   मैं बिछुड़ गयी थी अपनी रूह से जुड़े 
उस रिश्ते से 
~~~~~~~~~~~~~~~~~
 दर्द की महक यूँ ही नही महसूस होती 
जिन्दगी  भर चलना होता पड़ता  हैं फसलो के साथ 
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
 मैं फिर जन्म लूंगी 
 सीने में जलती आग से  
 लिखूंगी नज्म 
 माँ के आंसुओ को हंसी में बदलने के लिय 
 बीजी की पीठ पर पढ़े निशानों को 
आग से लड़ना सिखाऊंगी ( आंसू आगये   अपनी मरहूम माँ जो याद आगयी )
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
 वो तो बुत बनी थी 
जब उसे डोली में डाल 
उसके पर कतर 
पिंजरे  में डाल  दिया गया था 
~~~~~~~~~~~~~~~~~
 आज फिर उसने कहा 
 ला हीर _______ मैं तुम्हारी नज्मो की किताब छपवा  दूँ 
 बता ! मैं इन हँसते जक्मो को कैसे तसल्ली दूँ 
~~~~~~~~~
                                 कही कही तो लगता हैं हीर जी नज़्म लिखती नही हैं उनको जीती हैं  उनके रोजाना की बोलचाल के शब्द भी एक नज्म बन जाते होंगे   | , मन को झकझोरती कही तो कही कोमल भाव से मुस्कुराती , कही आक्रोशदिखाती  तो कही विधि के विधान के आगे  तो कही मजबूर दोशीजा सी हीर के नज्मो की यह पुस्तक एक अनमोल तोहफा मेरे संग्रह में |
                                                              एक पाठक  हूँ मैं कोई प्रोफेशनल समीक्षक  नही  इसलिय एक पाठकीय समीक्षा   करने की हिम्मत नही हो रही हैं . उस हीर की  लिखी खामोश चीखो " को कैसे शब्दों की माला पहना दूँ जिनकी गूंज  दूर दूर तक गूँज रही हैं  और निर्वात में हरेक उन लफ्जों से खुद को रिलेट कर रहा हैं  | जिनका परिचय ही पन्नो में नही समा सकता उनके लिखे लफ्जों को कैसे मैं चंद लफ्जों में  बयां कर दूँ  उस पर पुस्तक में बने रेखाचित्र सोने पर सुहागा  
                                                          इस पुस्तक को आप हीर जी  से कह कर भी भी मांगा सकते हैं या आगमन प्रकाशन   से भी  | पुस्तक की कीमत २०० रुपये  कही भी मायने नही रखती  अगर आप सचमुच नज़्म के गहरे भाव पढ़ने के आदि हैं .और उसके बाद उनको भीतर  जीने के भी ..\ सहेजने के भी 
 बाकौल हरकीरत हीर जी 
 ~~
"पता हैं 
 मैं ख़त नही हूँ \ ख़त होती तो कोई पढता\ कोई सहेज कर तो रखता / मैं तो नज्म हूँ /जिसे हर कोई  पढता तो हैं  / पर सहेजता नही "
  आप सबको यह संग्रह अवश्य पसंद आएगा 
 हीर जी आने वाली सभी पुस्तके कालजयी हो अहमे और भी , बार बार उनको पढने का मौका मिले यह  इच्छा रखती हूँ 
  इस शुभकामना के साथ उनके लिखे के साथ खुद  को रिलेट करते हुए  अपने लिखे शब्द  के साथ हार्दिक बधाई 
" मुझे तो गुमान था  फक्त  मिसराहूँ तुम्हारे ख्यालात का 
 तुमने तो मुझे  नज़्म / ग़ज़ल कहकर मुकम्मल कर दिया ."

अभी तो सुन रही हूँ उनकी खामोश चीखो के आर्तनाद को मन के गहरे  भीतरी कोनो में \से




 यह समीक्षा   दैनिक पूर्वोदय  में प्रकाशित हुयी हैं  रविवार 22/२/२०१५   को



Friday, December 26, 2014

सिसकिया


'अकेली होती हूँ तो आपकी यादे चारो तरफ से घेर लेती हैं , कानो में आपकी आवाज़े गूंजती हैं और मैं यहाँ इस नदी के किनारे पर आकर बैठ जाती हूँ और एक चलचित्र की तरह यादे चलती रहती हैं सामने , पर मुझे लफ्ज़ नही मिलते उन यादो को लिखने के लिय ,समेटने के लिय बस अहसासों में जी लेती हूँ 
मेरी सुबकिया

सिसकिया किसी के लिय मायने नही रखती मेरेआंसू भरी आँखे जब जाते हुए बरस को मुड़ कर देखती हैं तो एक आह निकल जाती हैं एक टीस उभर आती हैं और मैं फिर से उदास होकर आपको याद करने लगती हूँ | अनेक पश्चाताप मन में आते हैं अब जब सबसे सुनती हूँ आपके दर्द की कहानिया और नाराजगी होती हैं अपनी बेबसी से और बुरा लगता हैं अब अपना मौन | काश मैंने भी आपका दर्द महसूस किया होता काश कुछ भागीदार होती आपकी तो एक स्पर्श मेरा भी होता कि इश्वर पर भरोसा रखो सबका अपना अपना भाग्य ...... न किस्मत ले सकते हैं ना दे सकते हैं किसी को , कम से कम दिलासा तो होता आपको कि दर्द तनहा नही पिया आपने ......... मिलोगे न आप क़यामत के रोज़ .माफ़ी मांगनी हैं आपसे . काश यह प्रकृति भी मेरे मन को शांत कर पाती जितना आपने अपने मन को शांत रखा था | प्लीज लौट आओ न किसी भी बहाने से / मेरा मन बहुत उदास हैं आपके चले जाने से 

Wednesday, December 17, 2014

अंतिम मिलन

आज मिल रही हैं धरती अपने आसमान से शायद आखिरी बार , ख़ामोशी से आसमान आज उतर आया धरती की आलिंगन करने | पिता आसमान ही होता है ना और माँ धरती , धरती पुकारती रही आसमान को ...............
आसमान की रही होगी कुछ अपनी मजबुरिया , जार जार रो रहा हैं आज आसमान , कैसे कहे विदा अपनी इस धरती को जिसने न जाने कितनी बार सहे भूकंप कितनी बार सैलाब आये पर फिर भी साथ रही आसमान के . क्षितिज तक साथ उनका पर फिर भी आज अलग थलग .से दीखते रहे .. आज आसमान चाहता था धरती को दर्द से मुक्त करना . और धरती अपने दामन में अपने हिस्से के दर्द चीत्कारे आहे गम लेकर सो रही हैं और उसका अचेतन मन मांग रहा हैं मुक्ति इन सबसे .....पर सब तक साँस हैं तब तक आस हैं धरती के हर पौधे को हर पेड़ को .जिन्दगी की .चमत्कार की


 यह वो दिन था जब भापा  जी ( पापा) माँ से मिलने हॉस्पिटल गये थे  और माँ कोमा में चली गयी थी उनका इंतज़ार करते करते ...और कभी न लौट कर आई और पापा भी दो महीने बाद उनके पास चले गये 

मन का कोना

माँ को अभी गये १० दिन हुए थे और मैं आंसू पोंछ कर उनके घर पर थी उनके एकलौते बेटे की शादी थी रिश्ता तो ससुराल से था परन्तु मायके से एक ही गोत्र होने के कारन उन्होंने अपने बेटे को मुझसे राखी टिक्का कराया क्युकी उनकी अपनी कोई बेटी न था | कई बरस मैंने उनके देने के बावजूद राखी पर कोई शगुन नही लिया की जब कमाएगा तब देगा | समय गुजरता गया नौकरी लग गयी उनके बेटे के , मुझे भी राखी पर उपहार मिलने लगे सब ठीक सा रहा अपने भाइयो के साथ मैंने उनके बेटे को भाई मान कर हमेशा जन्मदिन दीवाली पर उपहार दिए . बेटे की शादी तय होने लगी मुझे बहन बनाकर साथ ले गये परन्तु उसके ससुराल वालो के लिय मैं बस उनकी रिश्तेदार थी , रिश्ता ना चाहते हुए भी वही हो गया , मेरे भाई के गुजर जाने पर जैसे सब अचानक बदल गया \ खुद तो वोह आई मेरे भाई की मृत्यु पर अफ़सोस करने परन्तु अपने बेटे को नही आने दिया न कोई कॉल आया उसका .की मत रोवो मैं भी तो हूँ न तुम्हारा भाई | मन को समझाया हलके स्वर में शिकायत भी की तो बोली मैं क्या करू आजकल के बच्चे ऐसे ही हैं क्या पता उसने कॉल किया हो तुमने ही न उठाया हो | अब राखी पर मैं अपने होम टाउन में थी एक दम अकेली , ४८ घंटे तक मैंने घर का ताला भी नही खोला २४ घंटे तक एना का दाना भी मुंह में नही लिया जवान भाई के जाने का गम सीने में लिय जार जार रोटी रही मेरी इतनी उम्र में पहली राखी ऐसी गुजरी जब मैंने किसी कलाई पर राखी नही बंधी , सब भाई बहन अपने अपने घर के कोने में रोते रहे पर उस भाई ने एक बार भी कॉल नही की की मैं हूँ ना ! , बस मेरे नाम का एक सूट डेल्ही में बच्चो के पास छोढ़ दिया की राखी के नाम का , तब भी बुरा लगने के बावजूद मैंने कुछ नही कहा | रिश्ते हैं निभाने पढ़ते हैं कई बार वैसे भी मेरी तस्वीर कुछ और ही बनायीं हैं उन्होंने सब जगह . माँ का ग्यारहवा दिन और उनके उसी एक्लोते बेटे की सगाई ...मैं आंसू पोंछ कर सबसे आगे मौजूद थी जिम्मेदारी से सब सम्हालते हुए अगले रोज बारात में सब आंसू संताप भूलकर फिर से बारात से लेकर बहु को घर लाने तक सब रोले अदा किये ...... करवाचौथ से दीवाली तक सब त्यौहार का नेग लेकर उनकी बहु का शगुन किया ..............आज भाई दूज हैं और मैं दिल्ली में ही हूँ .............और वोह भाई नही आया क्युकी माँ का कहना हैं उसके साले ने आना हैं ...........उसकी बहु आगयी अब ---------- कहाँ सुनते हैं आजकल के बच्चे माँ की बात _______ अब क्या कहूँ मैं भी ..........जब मेरा अपनाछोटा भाई नही रहा तो दूसरा कहाँ भाई बनेगा . रिश्ते भावनाओं से बनते हैं सुना था पर आज जब मुझे भावनात्मक सपोर्ट की जरुरत थी तो कहाँ गये वोह राखी के धागे ............ और मैं बेवाकूफ अपनी माँ के लिय सही से रो भी न पायी कि किसी के ब्याह का शगुन ख़राब न हो ......................... मन बहुत आंदोलित हैं कोई कुछ भी कहे अब मैं हर्ट हूँ तो हूँ बस
मन का कोना ........कभी कभी खोलना ही पड़ता हैं ...

Wednesday, January 29, 2014

बहुत याद आओगे हमेशा

सुबह सुबह लैंड लाइन की बेल बजी . सर्दी थी और मन नही किया की उठकर दूर रखे फ़ोन को उठाऊ  .सोचा बजने देती हूँ जिसका होगा सेल पर कॉल करेगा  या दुबारा बाद में कर लेगा ....... बेल लगातार बज रही थी  फिर उठकर फ़ोन उठा ही लिया  कालर ऑय डी में भाई का नंबर था  फ़ोन उठाते ही भैया की भरी हुयी आवाज़ सुनाई दी तेरी तबियत ठीक हैं  ,मैंने हाँ ठीक हूँ आपकी ठीक नही लग रही .बोले नही मैं तो ठीक हूँ पर एक बुरी खबर हैं  किशोर नही रहा ........ मैंने झट से कहा कौन किशोर? अपना किशोर नरिंदर वीर जी का बेटा  !!! हाआआआअ........... झट से बैठ गयी मैं सामने बिस्तर पर .रात एक बजे तक तो मैंने भी देखा उसको यहाँ फेसबुक पर ऑनलाइन आप कह रहे सुबह ५ बजे चला गया अनंत यात्रा पर ........
         अभी मायके से लौटी हूँ  उसके अंतिम संस्कार के पश्चात  सब चचेरे भाई बहन   रिश्तेदार वहां एकत्र थे किशोर  मेरे ताऊ जी के बेटे नरिंदर वीर जी का बेटा  था  नरिंदर वीर जी की मृत्यु भी २३ साल पहले ट्रेन एक्सीडेंट में हो गयी थी  माँ ने बहुत मुश्किलों से  अपने बेटो कोपढाया था  आज इतिहास फिर से उनके घर की दहलीज़ पर खड़ा था   आज फिर एक  सुहागन  चीखे मार मार  कर रो रही थी की मैं रात को ३ बजे तक बाते करती रही उसके बाद ही सोयी  ......... और सुबह ६ बजे बेटे ने कहा पापा उठो आज मुझे स्कूल छोड़ने आप चलना  .मैं रिकक्षा से नही जाऊंगा  ........ और पापा एक दम ठन्डे  चुपचाप बिना किसी को तकलीफ दिए ...... सिर्फ ब्लड प्रेशर  थोडा ज्यादा था रात को और दवाई ली थी उसकी ........... डाक्टर कहते हैं .हार्ट sunk हो गया  .............


    .  वहां जाकर एक अजीब से  विरक्ति हुयी .एक फेस बुक पर पढ़ी कविता की लाइन भी याद आई "समूह में रोती हैं स्त्रियाँ " माँ के अपने कारन थे पत्नी के अपने हम बहनों के अपने   भाई के अपने .सबके पास कारन थे उसके जाने पर रोने के .परन्तु इश्वर  के पास क्या कारन था उसको अपने पास ले जाने का  क्या उसके बेटे को बाप की जरुरत नही थी  क्या उसकी पत्नी  जिसका न कोई भाई हैं  न उसका पिता  उसका भी ख्याल नही आया .. सिर्फ ८ साल की शादीशुदा जिन्दगी भी कोई  जिन्दगी होती हैं ..और मां उम्र भर पति के बिना रह कर अब बेटो के सहारे बुडापा काटने की सोच रही थी .....मन बहुत उदास हैं ......लगता हैं दुनिया कुछ भी नही ....अगर यह देह  किशोर हैं तो देह तो हमारे सामने हैं किशोर कहा हैं ? अगर किशोर एक आत्मा थी  तो यह देह क्या थी ? क्यों हम मोह कर रहे थे इस देह का ...........लेकिन अपने हाथो पाला  बड़ा हुआ किशोर .जिसने सबसे पहले  हमें बुआ होने का अहसास दिलाया था  खानदान का पहला  पोता जिसके पैदा होने पर हमारी दादी ने कहा था  आगया मुझे सोने की पौड़ी चडाने  वाला ................ आज सबसे मोह तोड़ कर ना जाने कौन से लौक में चला गया हमें रोता बिलखता हुआ छोड़  कर ........
 लव यू मेरे भाई  तुम हमेशा याद आओगे .तुम्हारे जाने का दिन नही था आज ........  अभी तुझे बहुत साल जीना चाहिए था .पत्नी रिया के लिय बेटे अमन के लिय अपनी माँ शशि  भाभी के लिय

Tuesday, January 28, 2014

पुरुष विमर्श

कागज कोरा हैं .हर्फ क्या लिखू . दिल की बात लिख नही सकती जो लिखूंगी भी तो निरा झूठ होगा पर तुम तब भी उस में ढूंढ ही लोगे अपने हिस्से का सच यह तुम पुरुष ऐसे क्यों होते हैं जब लफ्जों से कुछ कहो तो शायद समझ कर भी नही समझते और जब मौन होकर भी सामने से गुजर जाओ यह सारे मनोभाव पढ़ लेते हैं . कभी कभी हैरानी होती हैं पुरुष इतने धीर गंभीर चुप्पे से कैसे हो सकते हैं छोटी छोटी बातो पर खुश होकर भी खुश नही दीखते बड़े बड़े गम भी विचलित कर जाए तो भी संयत रहते हैं .बहुत कम देखा हैं पुरुषो का बिखरना ...... एक स्त्री घर चलाती हैं तो सब उसे महान होने का दर्ज़ा दे देते हैं एक पुरुष भी उम्र भर पैसे कमाकर उसी घर को चलता हैं तो वोह महान क्यों नही . कमियाँ स्त्री पुरुष दोनों में होती हैं अगर पत्निया पति पीड़ित होती हैं तो कई पुरुष भी तो पत्नी पीड़ित होते हैं लेकिन यह स्त्री विमर्श ही क्यों होता हैं पुरुष विमर्श क्यों नही ..रिश्ते सिर्फ स्त्री ही नही ढोती पुरुष भी ढोता हैं स्त्री अपनी सखी सहेलियों बहनों के सामने अपना रोष प्रकट करके सामान्य हो जाती हैं परन्तु पुरुष ज्यादा से ज्यादा अपनी पत्नी के सामने ही रोष प्रकट करना चाहता हैं तब उसे पत्नी को शोषित करने का आरोप लगा दिया जाता हैं ... स्त्रिया पुरुष बन जाना चाहे और पुरुष स्त्रीयोचित व्यवहार करे तो दिक्कत हैं ...... असली अस्तित्व पुरुष के पुरुष बने रहने में हैं स्त्री के स्त्री बने रहने में हैं ....
पता हैं आज अखबार पढ़ रही थी ....आज की नही कई साल पुरानी बक्से में बिछाई थी कभी कई साल पहले .एक खबर पर नजर पढ़ गयी . स्त्रियाँ जब पैसे कमाती हैं उनके मन में हमेशा यह भाव रहता हैं मेरे पैसे ....... मैंने कमाए ....... मैंने खर्च किये मैंने घर सम्हाला .. मैंने तुम्हारी परिवार के लिय यह किया ....... सब ऐसा नही करती सो कृपया अपने तर्क न दे इस बात पर मुद्दे को समझे परन्तु ज्यादातर पुरुष घर के लिय पैसे देते हैं चाहे कम दे ज्यादातर पुरुष चुप रहते हुए घर के लिय भरसक करने की कोशिश करते हैं और स्त्री अगर लचीले स्वाभाव की होती हैं तो पुरुष उदार होता चला जाता हैं ....... जैसे लडकियों को बचपन से ससुराल सास ससुर का होव्वा सताता हैं वैसे ही लडको को भी बीबी ऐसे होती वैसे होती का ....... अगर स्त्री अपना घर छोड़ कर आती हैं तो पुरुष भी अपने परिवार के साथ उसकी स्त्री का समंज्स्स्य कैसे हो की कोशिश करता ...... जब लड़की में लचीलापन न हो और लड़के में समझदारी तो फॅमिली में विग्रह होना शुरू हो जाता हैं ...... आप सब कहेगे आज मुझे क्या हुआ यह सब ...........एक्चुअली आज मेरी सहेली के घर यही सब हुआ पुरुष चुप्पा शख्स हैं और स्त्री महान हैं और परिवार परेशान हैं ऐसे में मुझे अपनी माँ की एक सीख याद आती हैं जो वोह अक्सर हम सब से कहती थी .की तुम शादी करके अहसान नही कर रही हो किसी लड़के पर , इश्वर ने स्त्री बनायीं हैं सृष्टि का सृजन करने के लिय और पुरुष को साधन बनाया हैं परन्तु जब भी साधनों का तुम मानसिक शोषण करोगी तो सृष्टि का सृजन सही से नही होता और एक कुंठित समाज जन्म लेगा इसलिय तुमको शादी के बाद सिर्फ २-३ बरस उनके हिसाब से चलना होगा जैसे उनके परिवार की संस्कार होगे आदते होगी ......... यह २-३ बरस अगर तुमने धीरज से काट लिय तो तुम्हारा पति और उसका परिवार तुम्हारा होगा .लेकिन अगर २-३ माह बाद ही तुम अपने भीतर की स्त्री को जगा दोगी और भोग लिप्सा जाग्रत हो जायेगी तुम्हारे भीतर चाहे वोह भोग लिप्सा अधिकारों की हो या साधनों की ..........तुम एक अछि स्त्री नही बन सकोगी ..... आखिर घर के दस लोग तुम्हारे अनुसार बदले ..और तुम एक उनके अनुसार खुद को न ढालो ......आज जैसा करोगी कल तुम्हारी संतान भी उसका दुगुना तुम्हारे साथ करेगी ....... स्त्रीत्व का सम्मान करना परन्तु अपने स्व की रक्षा करते हुए आत्म सम्मान के साथ दुसरे की आत्मसम्मान की इज्ज़त करते हुए ..................

.कभी कभी लगता हैं यह माँ मेरी ही ऐसी हैं या सबकी माँ उनको कोई न कोई सूत्र वाक्य देती हैं जिन्दगी को जीने के लिय ........... प्लीज शेयर करिए न अपनी माँ के दिय सूत्र वाक्य .........
 — 

Monday, November 25, 2013

आरुषि हत्याकांड . ::कसूरवार कौन?

आरुशी ह्त्या कांड ........माता पिता ने क्षणिक आवेश में आकर अपनी ही बेटी का कतल कर डाला और साथ ही उसका साथ देने वाले अपने नौकर का भी ....... उस एक पल में उनका गुस्सा इतना भयावह हो गया कि वोह भूल गये कि उनकी इकलोती बेटी हैं अगर  उन्होंने अपनी बेटी को अपने नौकर के साथ आपतिजनक स्तिथि ( जैसा की कहा जा रहा हैं ) में देखा तो एक प्रश्न उठना तो जायज है ना कि आरुशी ने ऐसा क्यों किया . नौकर औरआरुषि हम उम्र नही थे / अगरपुरुष नौकर रखा हुआ था तो क्या नुपुर तलवार को समय से घर नही आना चाहिए था / क्या एक माँ को उम्र के इस मोड़ पर अक्सर घर पर अकेले रहने वाली बेटी से दोस्ताना सम्बन्ध नही बनाने चाहिए थे / क्या एक पिता जो अपनी बेटियों के लिय हमेशा रक्षात्मक मुद्रा में रहता हैं उसको पहले कभी आभास भी नही हुआ अपनी बेटी और नौकर के बीच के रिश्ते के बारे में / उनकी और कोई संतान नही थी तो उन्होंने समर्पण क्यों नही किया पुत्री की आवेग में की गयी ह्त्या के बाद / उस महिला की जिन्दगी कितनी ख़राब हुयी होगी जिसका रिश्ता राजेश तलवार से जोड़ कर उसे कटघरे में खड़ा कर दिया गया था / नुपुर और राजेश तलवार ने एक जघन्य कृत्य किया हैं परन्तु हेमराज का कसूर भी कम नही साथ ही आरुशी का भी ..हाँ उनको जो सजा दी गयी वोह नही मिलनी चाहिए थी अपनी बच्ची को समझा बुझाकर अपने में बदलाव लाकर दो परिवारों को बर्बादी से बचाया जा सकता था .... मेरी तो बिनती हैं उन काम  काजी महिलाओ से जो अपनी आर्थिक स्वतंत्रता के नाम पर अपनी बेटियों को अकेले छोड़ जाती हैं kachhi उम्र की लडकिया इन्टरनेट और टी.वी से प्राप्त ज्ञान से बहुत जल्दी बड़ी हो जाती हैं और सही गलत  भूल जाती हैं ....दादी और नानी के साथ रहना आजकल के बच्चे भी गवारा नही करते क्युकी उनके मन में अपरोक्ष रूप से उनकी माँ ही स्वतंत्रता का पाठ पढ़ा रही होती हैं अपनी स्वतंत्रता के नाम पर ........ समाज में आज अगर यह विसंगतिया आरही हैं उसके जिम्मेदार सिर्फ पुरुष नही हैं महिलाए भी हैं और संतान को दी जाती उनकी शिक्षा भी ............... एक परिवार का वातावरण अगर सही हो तो कोई भी लड़का या लड़की ऐसे किसी के बरगलाने में आकर अपना जीवन ख़राब नही करती और नाही संयुक्त परिवार के बच्चे मानसिक रूप से इतने कमजोर होते हैं कि जल्दी से दूसरो के प्रभाव में आजाये .......... समय की मांग हैं हमें अपने पारावारिक ढांचों की एक बार फिर से समीक्षा करनी होगीबच्चो पर विश्वास करे लेकिन अंधा नही उनकी मन की और शरीर की भाषा भी पढ़ना सीखे ....... पैसे कमाना एक कला हैं तो परिवार सम्हालना भी विज्ञान ......... ऐसा न हो कल विदेशो की तर्ज़ पर यहाँ भी गुड पेरेंटिंग की कक्षाए लगने लगे और घर के बुजुर्ग किसी वृद्ध आश्रम में सिसकिया लेते रहे .आज की युवा पीढ़ी कल बुजुर्ग होगी ......याद रहे ...........समय हैं आरुशी हत्याकांड से अपने आस- पास का वातावरण सुधारने का .न की तबसरा करने का / कोर्ट  की सजा /गुनाह  ठहराना  एक दम जायज  और  आने वाले समय में माता - पिता  को सबक .........
 नीलिमा  शर्मा 

Monday, November 11, 2013

13 नवंबर: लक्ष्मी कृपा पाने का एक और दिन, करिए इन में से कोई 5 काम...साभार दैनिक भास्कर . कॉम

कार्तिक माह की अमावस्या यानी दीपावली के बाद लक्ष्मी कृपा दिलाने वाला एक और खास दिन आ रहा है। यह दिन है बुधवार, 13 नवंबर 2013. कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को देवउठनी एकादशी या देवप्रबोधिनी एकादशी कहा जाता है। इस एकादशी से महालक्ष्मी के स्वामी यानी भगवान विष्णु पुन: जागते हैं। इसके पूर्व आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी से श्रीहरि शयन करते हैं और चार माह बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुन: जागते हैं। श्री विष्णु के शयन काल में सभी मांगलिक और विवाह आदि कार्य वर्जित रहते हैं। भगवान विष्णु के जागने का दिन होने की वजह से य यह बुधवार काफी खास है, इस दिन कुछ उपाय कर लिए जाए तो महालक्ष्मी की कृपा भी बहुत जल्द प्राप्त हो जाती है।
इस बुधवार से सभी मांगलिक कार्य पुन: प्रारंभ हो जाएंगे।
शास्त्रों के अनुसार जो लोग इस एकादशी पर व्रत रखते हैं उनके सभी पाप नष्ट होते हैं और महालक्ष्मी की प्रसन्न प्राप्त होती है।
- देवउठनी एकादशी पर तुलसी और शालिग्राम का विवाह रचाया जाता है। जो भी लोग इस परंपरा का निर्वाह करते हैं उनके घर में स्थाई लक्ष्मी वास करती हैं और जीवनभर धन-दौलत की कोई कमी नहीं होती है। यदि आप तुलसी विवाह नहीं रचा सकते हैं तो कम से कम तुलसी का विशेष पूजन अवश्य करना चाहिए।
- यदि आप चाहे तो इस एकादशी पर व्रत भी रख सकते हैं। व्रत करने पर अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और भगवान विष्णु के साथ ही महालक्ष्मी की भी विशेष कृपा प्राप्त होती है। व्रत रखने वाले व्यक्ति को दशमी तिथि यानी मंगलवार से ही शुद्ध-सात्विक भोजन करना चाहिए। इसके बाद एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें और नित्य कर्मों से निवृत्त होकर विष्णु एवं लक्ष्मी की पूजा करनी चाहिए। भगवान को तुलसी के पत्ते भी चढ़ाएं। द्वादशी तिथि यानी गुरुवार के दिन सुबह विष्णु पूजा के बाद गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएं। इसके बाद स्वयं भी भोजन करें।
एकादशी के दिन सुबह जल्दी उठें और तांबे के लोटे में जल लें और उसमें लाल मिर्ची के बीज डालकर सूर्य को अर्पित करें। इस उपाय से आपको मनचाहे स्थान पर प्रमोशन और ट्रांसफर मिलेगा। यह उपाय नियमित रूप से करना चाहिए।
किसी ऐसे शिव मंदिर में जाएं जो श्मशान में स्थित हो। उस मंदिर में शिवलिंग पर दूध, जल आदि अर्पित करें। दीपक लगाएं। इस उपाय स्थाई लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। - इस दिन सुबह जल्दी उठें और नित्य कर्मों से निवृत्त होकर तुलसी के पत्तों की माला बनाएं और इसे महालक्ष्मी को अर्पित करें। ऐसा करने से धन में वृद्धि होगी।
- एकादशी की शाम को किसी मंदिर में एक सुपारी और तांबे का लोटा रख आएं। इसके साथ ही कुछ दक्षिणा भी रखें। इस उपाय से भी देवी-देवताओं की कृपा प्राप्त होती है। - इस दिन यदि संभव हो सके तो किसी किन्नर से उसकी खुशी से एक रुपया लें और इस सिक्के को अपने पर्स में रखें। बरकत बनी रहेगी।
- एकादशी की रात में लक्ष्मी और कुबेर देव का पूजन करें और यहां दिए एक मंत्र का जप कम से कम 108 बार करें। मंत्र: ऊँ यक्षाय कुबेराय वैश्रववाय, धन-धान्यधिपतये धन-धान्य समृद्धि मम देहि दापय स्वाहा।
रात को सोने से पहले किसी चौराहे पर तेल का दीपक जलाएं और घर लौटकर आ जाएं। ध्यान रखें पीछे पलटकर न देखें। - किसी शिव मंदिर जाएं और वहां शिवलिंग पर अक्षत यानी चावल चढ़ाएं। ध्यान रहें सभी चावल पूर्ण होने चाहिए। खंडित चावल शिवलिंग पर चढ़ाना नहीं चाहिए।
प्रतिदिन पूजन के बाद घर के सभी कमरों में शंख और घंटी बजाना चाहिए। इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा और दरिद्रता बाहर चली जाती है। मां लक्ष्मी घर में आती हैं। - घर में लक्ष्मी को आमंत्रित करने के साथ ही उन्हें सहेज कर रखने के जतन करना भी महत्वपूर्ण है। इसलिए, नकदी और गहने-जेवरात की अलमारियां दक्षिण या पश्चिम की दीवारों पर हों और उत्तर या पूर्व की ओर खुलें। ख्याल रहे, इन अलमारियों पर दर्पण न लगा हो।
- लक्ष्मी, भगवान नारायण की पत्नी हैं और नारायण को अत्यंत प्रिय भी हैं। उनकी उत्पत्ति समुद्र मंथन से हुई है। शंख, मोती, सीप, कौड़ी भी समुद्र से प्राप्त होने के कारण नारायण को प्रिय हैं। अत: लक्ष्मी पूजन में समुद्र से प्राप्त वस्तुओं का उपयोग अधिक किया जाता है। अत: जब भी लक्ष्मी पूजन करें ये चीजें जरूर रखें। पूजन के बाद इन चीजों को धन स्थान पर स्थापित करने से धन वृद्धि होती है।
इस दिन लक्ष्मी-विष्णु के बाद प्रमुख द्वार पर लक्ष्मी के गृहप्रवेश करते हुए चरण स्थापित करें। - श्रीयंत्र, कनकधारा यंत्र, कुबेर यंत्र को सिद्ध कराकर पूजा स्थान पर या तिजोरी में रखा जाता है।
- दक्षिणावर्ती शंख के पूजन व स्थापना से भी धनागमन और सुख प्राप्ति का लोकविश्वास है। - लक्ष्मी के साथ 11 कौडिय़ों की पूजा कर उन्हें पूजास्थल, तिजोरी एवं व्यवसाय स्थल पर रखना शुभ-समृद्धि दायक माना जाता है।
इस दिन आंकड़े के गणेश की पूजा व स्थापना से सम्पन्नता का आशीष मिलता है। - लक्ष्मी पूजन में एकाक्षी नारियल या समुद्री नारियल की पूजा करने एवं तिजोरी में इसे रखने से घाटा नहीं होगा एवं समृद्धि आएगी।
एकादशी की रात्रि में रामरक्षा स्तोत्र का पाठ व अनुष्ठान करने से सफलता एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही हनुमान चालीसा का पाठ भी किया जा सकता है। - रात्रि में लक्ष्मी पूजन करें और उस समय कमल के पुष्प अर्पित करें और कमल गट्टे की माला से लक्ष्मी मंत्र ऊँ महालक्ष्मयै नम: का जप करें। इससे देवी लक्ष्मी की प्रसन्नता प्राप्त होती है।


यह पोस्ट दैनिक भास्कर .कॉम से कॉपी की गयी हैं




Monday, October 28, 2013

चश्मेबद्दूर

 अहोई अष्टमी का व्रत था बच्चो की माँ इस व्रत को करती हैं यह व्रत परंपरा से हमारे परिवार में नही किया जाता थापरन्तु बच्चोके हित की कामना से बस मैंने भी बच्चो के जन्म से कुछ दिन पहले ही इस व्रत को करने की मन्नत मान  ली थी मन ही मन में और फिर बड़े बेटे के जन्म के बाद से यह व्रत करती आ रही थी इस बार भी सुबह जल्दी सोकर उठी और जल्दी जल्दी सब काम निबटाने लगी  बड़ा बेटा पढाई की वज़ह से घर से बाहर दिल्ली  में हैं  उसको फ़ोन किया  ..छोटा बेटा देर रात तक पढता रहा था सो उसको सोने ही दिया उठाया ही नही १२ बज  गये थे माँ ने व्रत किया हो बेटे के लिय और वोह भूखा सोया रहे सोचकर मन में बुरा लग रहा था सो बेटे को आवाज़ लगायी कि उठ जाओ और बताओ क्या नाश्ता बने तुम्हारे लिय  क्योकि उसके खाने के नखरे बहुत ज्यादा हैं  उसने आँखे खोलते ही घड़ी की तरफ देखा और बोला" मम्मा!!  उठाया क्यों नही ........मुझे  तो ट्यूशन जाना था .अब पक्का लेट हो जाऊँगा "
और तेजी से बाथरूम मैं घुस गया .. मैंने भी जल्दी से एक गिलास ढूध गर्म कर  और टोस्ट सेंक कर रख दिए कि लो जल्दी से खा लो एक घंटे बाद वापिस आओगे तब तक मैं खाना बना लूंगी ....  उफ़ माँ लेट हो रहा हूँ और आपको ढूध की पडी हैं  .
                                                                         मैंने जल्दी से एक मुठी बादाम उसको ज़बरदस्ती दिए अच्छा यह चबा लेना ..... . ट्यूशन से आते आते उसको  ३ बज गये कि माँ आज टीचर ने देर तक पढ़ाया मैंने कहा कि आओ खाना बना हुआ हैं  खा लो  तुम्हारा मनपसंद मटर पनीर बनाया हैं
                                            तब एक दम से बेटा बोला" नही माँ चार बजे आप कथा करोगी न तब खाऊँगा अभी जरा प्रोजेक्ट बनाने दो डिस्टर्ब ना करो "मुझे बहुत गुस्सा आया पर व्रत बेटे के लिय था तो उसको ही कैसे  कुछ कहती सो चुप रह गयी ..... और रसोई में  चली गयी ... तभी बेटा पीछे से वहां आया और हग करके बोला पापा के लिय व्रत रखा था तो कितना अच्छा तैयार हुयी थी चूड़ियां माला साड़ी पहन कर आज मेरे लिय भी तैयार होवो ना  .....मैंने कहा आज घर पर रहना हैं मंदिर जाकर पूजा नही करनी तो ऐसे ही ठीक हूँ साफ सूट तो पहना हैं बोला नही अच्छा सा सूट पहनो और अच्छे से तैयार हो जाओ ....  मैंने भी बेटे का मन रखने के लिय अच्छा सा सूट पहना औरअछे से तैयार होकर  चार बजे कथा शुरू की ........ और कथा के बाद बेटे को कहा कि अब तो कुछ खा लो सुबह से व्रत रख कर बैठे हो  ..बोला माँ अभी नही भूख लग रही सच में ........और हाँ एक बात तो बताओ जब पति अपनी पत्नी के लिय करवाचौथ का व्रत रख सकता तो क्या एक बेटा अपनी माँ की लम्बी उम्र के लिय व्रत नही रख सकता  मैं भी आज आपके साथ ही खाना खाऊँगा ...... मन एकदम से मौन हो गया अपने छोटे बेटे की बाते सुनकर ........ पापा के बाहर रहने से कितना परिपक्व सोचने लगा हैं मेराराजा बेटा  फिर भी मैंने जिद करके उसको एक गिलास ढूध पिलाया कि ढूध पी  सकते हैं ......तभी पति का फ़ोन आगया कि वोह आज रात घर आरहे हैं ८ बजे के बाद पहुँच जायेंगे पर हम व्रत का खाना खा ले क्युकी हम तारा देखकर खाना खाते हैं  ... बेटे ने कहा नही पापा आपके साथ ही खायेंगे आप आ तो जाओ जल्दी से .......
 मैं भी आकर नेट पार ब्लॉग देखने लगी क्युकी बेटे की जिद के सामने मेरी एक न चली .... ६ बजे के बाद मैंने कहा बेटा अब तारे निकल आये हैं मैं अर्क देती हूँ और उसके बाद मंदिर जाकर पंडितानी जी को बायना  देकर आती हूँ फिर एक साथ खाना खायेंगे ...... बेटा बोला माँ अभी आप सिर्फ खाना खा लो मैं  पापा के साथ खाना खाऊँगा .मैंने कहा ठीक हैं फिर मैं भी तभी खाना खाऊँगी .... और मंदिर चली गयी वहां से वापिस लौट रही थी कि रस्ते में  ना जाने क्या हुआ कि  मैं चक्कर खा कर गिर गयी और घुटने  और कोहनी मैं बहुत जोर  से चोट लगी खून बहने लगा     पड़ोसियों ने सहारा देकर घर तक पहुँचाया मुझे तो लगा कि आज घुटने की हड्डी गयी मेरी .......... बेटे ने कहा माँ जल्दी से   सिटी हॉस्पिटल चलते हैं .और  मेरे सेल से उसने डॉ गुप्ता को फ़ोन कर दिया और मुझे लेकर वहां पहुंचा   वहां सारे चेक- अप के बाद डॉ ने कहा कि कोई खास बात नही पट्टी बाँध  देते हैं घाव पर और गुम  चोटों के लिय  बर्फ की सिकाई कर देते हैं ...बेटा मेरा हाथ थामे वही खड़ा रहा ....... दर्द बहुत तेज था मेरे आंसू बहने लगे ...... बेटा बोला देखा ....  कहा था न व्रत न रखा करो   अब मैं हूँ ना आपके पास .  डॉ से वापिसी पर उसने मुझे  एक अच्छा सा कोफी मग लेकर दिया मैंने पुछा यह क्यों ????बोला जब हमें बचपन में इंजेक्शन लगता था तो आप भी कुछ न कुछ लेकर देती थी न  ...... मन भावुक ही हुआ जा रहा था ..... खैर घर पहुंचे तो मैंने कहा चलो खाना खा लेते हैं फिर  बोला आप बैठो और उसने मुझे व्रत का खाना  जो मैंने शाम को बनाकर रख दिया था सर्वे किया ....और मेरी थाली से सिर्फ एक ग्रास खाया ...... .  रात  को ९ बजे जब उसके पापा आये तब दोनों ने खाना खाया ....औरबाते करते करते  पापा से कहने लगा कि पापा आप ही बताओ कि यह व्रत सिर्फ मम्मी ही क्यों करे .हम सब क्यों न करे  ..... उसके पापा ने कहा कि बेटा आज तूने किया न माँ के लिय व्रत तो आज तेरी माँ के उप्पर आये कष्ट इतने में टलगये   ईश्वर तेरे जैसा प्यारा बच्चा सबको दे ........... क्या कहूँ अब मैं ???........ कैसे गुस्सा करू उस बेटे को कि तेरा ध्यान पढाई में क्यों नही लगता ..... जबकि जिन्दगी के सबक तो तुम कितने अच्छे से पढ़ रहे हो और उम्दा नंबर से पास भी हो रहे हो
 इन किताबी  नम्बरों   का क्या करूँ ...................  बस इश्वर से यही प्रार्थना हैं कि  यह संस्कार और  विवेक हमेशा रहे   और दुनिया की गरम हवा तुमको छु भी न पाए ....चश्मेबद्दूर ........

Wednesday, October 9, 2013

दिल के अरमान आंसू में बह गये

खट से जो दरवाज़ा खोला सामने तुम थे , मुह ढक कर सोये से ,दिल से जोर से धड़क उठा , हाथ  कंपाने लगे  आँखे भर आई , कितने दिन बाद तुमको देखा ना  सबकी जिद थी तुमसे दूर रहू   कोशिश भी बहुत की  पर तुम बहुत शिद्दत से याद आये , चुपके चुपके तुमको याद करती थी  पर डरती थी किसी को भी कहते कि  मुझे तुम्हारी याद आ रही हैं  तुमने भी शिद्दत से याद नही किया मुझे  वरना शाहरुख़ कहता हैं न  ज़र्रे  ज़र्रे  ने मिलाने की साजिश की हैं मुझे तो तुमसे दूर करने की साज़िशे  रची इस कमबख्त दुनिया ने , बहुत चाह तुम्हे मैंने . दिल किया जल्दी से तुम्हे छु लू भर लू बाहों में  चूम लू तुम्हारा माथा ,भूल जाऊ सुध - बुध , खोजाऊ असीम आनंद में तुम्हारे संग  वक़्त का पता ही न चले कब हम एक दुसरे के करीब आये ,हर भाव मन के मैंने तुमसे शेयर किये  प्यार वाले भी और उनसे हुए झगडे  वाले भी , सच्ची कसम से  तुम मुझसे अलग नही . बेवफा !! तुमको मेरी क्या परवाह तुम्हे कोई भी अपना ले उसके हो जाते हो पर तुम्हे मेरे अलावा कोई और छु दे तो  मेरा दिल
घबराता हैं , कितना अजीम है न तेरा मेरा रिश्ता ,तुम्हारे दुसरे रूपों ने मुझे लुभाने की कोशिश की पर सिर्फ तुम्हारी दीवानी हूँ , तुम्हे और भी मिल जायेंगे साथ !! पर ..मेरा क्या होगा ? कभी सोचा .. मेरे अकेलेपन के तुम्ही सहारे हो साथी हो ..जाओ मत बनाओ न मुझे अपना आदि ,इतना एडिक्शन अच्छा नही न तेरा ,
  अच्छा प्रॉमिस पहले की तरह नही आऊंगी तुम्हारे करीब , पक्का  पर अहसान मंद हूँ तुम्हारी  तुमने मुझे मेरी इनर सोल से जो मिलवाया  सुन!! अब नही रहा जा रहा मुझसे  इतने दिन बाद मिली हूँ  तो ... कुछ न कुछ तो लिखना बनता है न मेरा तुझको ,तुझपर,
अब आते जाते नजर जो पढ़ रही हैं तुम पर  .इतने दिन की छुटिया बिता कर आई हूँ   .. आओ न तुम भी बताओ न मेरे पीछे  क्या क्या हुआ ?

 अरे बेटा  !!! जरा इस कंप्यूटर को मेरे कमरे  में रख दो और  वाई-फाई  बंद कर दो
 वरना यह नीलिमा फिर से फेसबुक खोल कर निविया बन जायेगी और खो जायेगी उसी दुनिया में !!! ...:D




दिल के अरमान आंसू में बह गये  .हम कंप्यूटर के प्रेम में तनहा रह गये उफ्फ्फ मेरा कंप्यूटर !!! और मेरा उसके साथ प्रेम सबको इतना चुभता क्यों हैं ?

Sunday, October 6, 2013

पालतू जानवर गाय आज/ कल

 आज फिर से  दुधिया नही आया। .बहुत मुश्किल लगता हैं  डोलू लेकर   ढूध की डेरी पर जाकर लाइन में खड़े हो   जाना और इंतज़ार करना अपनी बारी का   तो उसको कह दिया भैया  जी घर पर ही ढूध दे जाया करो   और अब सुकून से घर पर ढूध  का इंतज़ार करते
……                                                                                           आज कल ढूध कुछ पीलापन लिए हैं  तो बच्चे  पीने में आनाकानी करने लगे   उनको लगता हैं  या आपने हल्दी मिलाकर पीने को दिया  या फिर ढूध वाले अंकल  जरुर कुछ मिलावट करते होंगे ,  अब यह मेरे शहरी बच्चे क्या जाने , जब गाय  का ढूध आएगा तो पीला ही होगा न। ……ग़ाय के नाम पर मायका याद आ जाता हैं  और बचपन भी। ……… किसान परिवार तो  घर में गाय का होना लाजिमी था बड़ा परिवार आखिर कहा से बाहर के ढूध से पूरा पढता फिर सबको ढूध  के इलावा  दही लस्सी और घर का माखन भी चाहिए होता था  और घर आने जाने वालो को लस्सी और ढूढ़ पिलाया जाता न की यह जहर जैसा कोला लिम्का ।  सो पापा ने हमेशा घर में गाय पाली ……।मुझे आज भी याद हैं जब पापा काली गाय लेकर आये थे मेरठ से  और हम सब भाई बहन इंतज़ार कर रहे थे  किअभी तक तो सफ़ेद गाय हैं घर में  यह विलायती  काली गाय कैसे होगी। …। और जब देखा तो ना जाने क्यों और  कब एक मोह सा जाग उठा  उस गाय को लेकर। माँ मुह अँधेरे उठ जाती और उनका पहला काम ही यही थाकि  सुबह उठकर घेर( वोह घर जहाँ पर पालतू
मवेशी रखे जाते हैं ) में जाना और वहां पर गाय की सानी करना और पानी पिलाना। । फिर  उनको नहला कर उनके नीचे से गोबर  हटाकर स्थान (छप्पर)को साफ़ करना। हम कब माँ के साथ यह सब काम करने लगे याद भी नही  अब कई बार माँ के घर से बाहर  जाने पर खुद ही भूसा दाल  कर उस में बिनौले  और सरसों की खली मिलाकर   सानी कर देते थे फ़िर धीरे धीरे माँ से ढूध धुहना भी सीख लिया    घर में दो गाय थी  तो उनका गोबर भी उठाकर कई बार तसले में भरकर छत पर  ले जाते और फिर माँ उसके उपले बनाती  तो हम भी बहादुर  के साथ माँ की हेल्प करते  और कभी कभी हम भी छोटे छोटे छेद  करते थे उन उपलों में किसी न किसी सलाई या लकड़ी से। धीरे धीरे माँ ने उपले बनाने भी सिखाये। … तब कभी मना भी करते तो माँ कहती कि  लडकियों को सब काम करना आना चाहिए   क्या पता कैसे घर में शादी हो जाए, और जानवर को जानवर नही घर कासदस्य  मान कर उसके सब काम करोगे  तो कभी कोई काम गन्दा नही लगेगा और छोटा भी नही लगेगा । ……… और ना जाने क्यों किसी अन्य जानवर को पालतू रूप में स्वीकार करने का मन नही किया आज तलक। …।  गाय को देखते ही आज भी न सिर्फ आदर भाव आता हैं अपितु माँ की सी भावनाए आती हैं अपनी माँ का उनसे जुड़ाव याद करके।  अब शहर में रहने लगे हैं तो ढूध में स्वाद ही कहाँ माखन जितना मर्ज़ी अमूल का खा ले जो तृप्ति सफ़ेद वाले ताज़े ताज़े में वोह अब  कहा। ……।
                                                                                   मन तो करता हैं अभी भी मेरे घर में गाय हो जैसे माँ के घर आज भी हैं तीन गाय। परन्तु स्थान की कमीबच्चो का नाक-भो सिकोड़ना   और सबसे बड़ी बात  अब सब करेगा कौन। ……अब तो आदत पढ़ गयी न। । अब क्या  मैं गोबर उठा पाऊँ गी ?क्या मैं सुबह उठकर बेड टी  का मोह त्याग कर पहले गायमाता की सेवा कर सकुंगी ………. अब सो कॉल्ड  मोडर्न वाइफ बन गयी हूँ न। … अब पड़ोस की डेरी से जब तब गोबर की दुर्गन्ध आ रही हैं कहकर बच्चे परेशान हो जाते हैं  तो क्या मैंने जब गाय का काम करूंगी तो  उनको मेरे पास से एक अजीब सी स्मेल  आएगी … गाय के प्रति प्रेम   और उसको पालने की अभिलाषा  मन के अन्दर किसी कोने मैं हैं  जो अब बस कभी कभार एक रोटी या गुड देने के साथ सीमित हो गयी हैं । समय के साथ साथ खुद को बदलना पढता हैं  कल कहना ही पड़ेगा ढूधिये को कि  भैया भैंस का ही ढूध  दे जाया करो कम से कम बच्चे पियेंगे तो सही .........................
                                                                                        अब पालतू गाय का ज़माना चला गया  अब उनका स्थान सिर्फ तबेलो में ही रह गयी हैं 

Sunday, September 8, 2013

हम मुज़फ्फरनगर वाले हैं

पिछले कुछ दिनों से मन बहुत विचलित हैं . बार बार माँ के घर फ़ोन करके पूछती हूँ कि सब ठीक से हो न , कोई भी सरवट या पचेंडा की तरफ मत जाना , बच्चोको घर के अंदर रखना , बार बार अपना मुज़फ्फर पेज ओपन करती हूँ बार बार वहां पर लोगो के कमेंट पढ़ती हूँ .. बस सब ठीक हो यह प्रार्थना भी करती हूँ .
वैसे कोई पहलीबार मुज़फ्फरनगर इस तरह दंगो की चपेट मैं नहीआया हैं , यहाँ पर लोग बहुत ही असहिष्णु हैं , जरा जरा सी बात पर मार - काट की किस्से यहाँ के लोकल अखबारों मैं अक्सर पढने को मिलते हैं . पैस से बहुत ही अमीर परन्तु जल्दी ही गुस्से में आजाने वाले यहाँ के मूल निवासी जब दोस्ती करते हैं तो भी ज़मकर और जब खुंदक में आ जाते हैं तो भी न आव देखते हैं न ताव, तब कितना नुकसान हुआ उसको देखकर बाद मैं पश्चाताप भी बहुत करते हैं . आपसी सौहर्दय से भी रहते हैं यहाँ बहुत सारे लोग . ईद पर और दीवाली पर अक्सर यह सौहर्दय देखने को मिलता नगर क्षेत्र मैं ... जिस बात को लेकर यह दंगा हुआ छोटी बात तो नही थी अपनी बहन को छेड़ने पर भाई का सामने आना लाजमी था .हाँ उसके बाद जो कतल-इ- आम हुआ वोह गलत हुआ ..और उस आग में हिन्दू और मुसलमान दोनों सम्प्रदायों के नेताओ ने जो रोटिया सेंकी हैं उस'से उन्हें फायदा होगा या नही समय बताएगा परन्तु आज न जाने कितने घर उजाड़ गये . पंचायत मैं गये लोगो पर जब घात लगाकर हमला बोला गया तो ना जाने कितने बूढ़े जवान गायब हो गये नदी में कूद कर जान बचानी पढ़ी कुछ लोगो को ... नेट पर खबरे पढ़कर जब माँ को सुनाई तो माँ बोली ऐरे ऐसा तो जब पकिस्तान बना था तब हुआ था इस तरह घात लगाकर हमला . अफवाहों का बाजार इस वक़्त बहुत गरम हैं पता नही कितना सच हैं कितना झूठ , एक बाजार में मुस्लिम की दुकाने जला दी गयी उनके बच्चे भी उसी दुकान की कमाई से जिन्द्दगी के सपने बन रहे थे , बात परवरिश की हुयी बात माहौल की हुई जरा सा संयम देखाने से आज घरो में सिसिकिया और आशंकाए न गूंज रही होती .आज हर मं
दिर मस्जिद में अपनी अपनी कौम की मीटिंग्स हो रही हैं सेना गश्त लगा रही हैं ..........कभी कभी तो मैं सोचती हूँ यह सेना बनी किस लिय थी बाहरी दुश्मनों से रक्षा के लिय या यह घर के लोगो को आपस में लड़ने पर बिच बचाव करने के लिय .जरा सा कुछ होता नही कि सेना को बुला लो ऐरे जब सेना ही सब काम करेगी तो यह पुलिस या नेताओ और प्रशासनिक अधिकारियों की जरुरत ही क्या हैं नए कप्तान जो यहाँ के लोग का मिजाज नही जानते क्या सम्हाल पाएंगे ?

मेरी प्रार्थना हैं उन सब पिताओं से जिनके बच्चे भी उनके साथ आज असलहे लेकर घूम रहे हैं देखना आज नही तो कल इस असलहे तुम्हारे ही किसी अपने का खून भी बह सकता हैं .....जो पराये को मारने में जरा नही पसीजता वोह एक दिन अपने पर भी दया नही खायेगा वक़्त संयम का हैं अपने धर्म और कौम की इज्ज़त करे परन्तु हाँ और न के बीच एक पारदर्शी दीवार होती हैं इसलिय एक बार सोचे

दिल दुःख रहा हैं देखकर , बताकर . के हम मुज़फ्फरनगर वाले हैं ...... कल ऐसा न हो कि हम कहे किसी को कि हम मुज़फ्फरनगर वाले हैं तो लोग कहे ऐरे वही न "जहा न हिन्दू किसी का न मुसलमान किसी का
अरे बचा नही वहाँ तो अब ईमान किसी का "

Neelima sharrma
सब कुछ जल्दी सामान्य हो की प्रार्थना के साथ
 —

श्रीगणेश नाम स्मरण


गणेश चतुर्थी की सभी मित्रो को हार्दिक शुभकामनाये 
 सर्वप्रथम पूजनीय गणेश महाराज जी स्मरण नित्य किया जाना चाहिए  उसके पश्चात  उनके लिय विभिन्न मंत्रो का जाप करना चाहिए 

 चमत्कारी  श्रीगणेश नाम स्मरण 
प्रणम्यं शिरसां देवं गौरीपुत्र विनायकम्।

भक्तावासं स्मरेन्नित्मायु: कामार्थसिद्धये।।

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदतं द्वितीयकंम्।

तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम्।।

लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च।

सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाष्टमम्।।

नवमं भालचद्रं च दशमं तु विनायकम।

एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननमं।।

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं यं पठेन्नर:।

न च विघ्रभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो।।

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनं।

पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम।।

जपेद्गणपतिस्तोत्रम षड्भिर्मासै: फलं लभेत।

संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय:।।

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्य लिखित्वा य: समर्पयेत। तस्य विद्याभवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत:।।
~~~~
(गणेश भगवन के १०८ नाम )
1, ॐ श्री विघ्नेशाय नम: 
2, ॐ श्री विश्व्वरदाय नम: 
3, ॐ श्री विश्वचक्षुषे नम: 
4, ॐ श्री जगत्प्रभवे नम: 
5, ॐ श्री हिरण्यरुपाय नम: 
6, ॐ श्री सर्वात्मने नम: 
7, ॐ श्री ज्ञानरूपाय नम: 
8, ॐ श्री जगन्मयाय नम: 
9, ॐ श्री ऊर्ध्वरेतसे नम: 
10, ॐ श्री महाबाहवे नम: 
11, ॐ श्री अमेयाय नम: 
12, ॐ श्री अमितविक्रमाय नम: 
13, ॐ श्री वेदवेद्याय नम 
14, ॐ श्री महाकालाय नम: 
15, ॐ श्री विद्यानिद्यये नम: 
16, ॐ श्री अनामयाय नम: 
17, ॐ श्री सर्वज्ञाय नम: 
18, ॐ श्री सर्वगाय नम: 
19, ॐ श्री गजास्याय नम: 
20, ॐ श्री चित्तेश्वराय नम: 
21, ॐ श्री विगतज्वराय नम: 
22, ॐ श्री विश्वमूर्तये नम: 
23, ॐ श्री अमेयात्मने नम: 
24, ॐ श्री विश्वाधाराय नम: 
25, ॐ श्री सनातनाय नम: 
26, ॐ श्री सामगाय नम: 
27, ॐ श्री प्रियाय नम: 
28, ॐ श्री मंत्रिणे नम: 
29, ॐ श्री सत्वाधाराय नम: 
30, ॐ श्री सुराधीशाय नम: 
31, ॐ श्री समस्तसाक्षिणे नम: 
32, ॐ श्री निर्द्वेद्वाय नम: 
33, ॐ श्री निर्लोकाय नम: 
34, ॐ श्री अमोघविक्रमाय नम: 
35, ॐ श्री निर्मलाय नम: 
36, ॐ श्री पुण्याय नम: 
37, ॐ श्री कामदाय नम: 
38, ॐ श्री कांतिदाय नम: 
39, ॐ श्री कामरूपिणे नम: 
40, ॐ श्री कामपोषिणे नम: 
41, ॐ श्री कमलाक्षाय नम: 
42, ॐ श्री गजाननाय नम: 
43, ॐ श्री सुमुखाय नम: 
44, ॐ श्री शर्मदाय नम: 
45, ॐ श्री मुषकाधिपवाहनाय नम: 
46, ॐ श्री शुद्धाय नम: 
47, ॐ श्री दीर्घतुंडाय नम: 
48, ॐ श्री श्रीपतये नम: 
49, ॐ श्री अनंताय नम: 
50, ॐ श्री मोहवर्जिताय नम: 
51, ॐ श्री वक्रतुंडाय नम: 
52, ॐ श्री शूर्पकर्णाय नम: 
53, ॐ श्री परमाय नम: 
54, ॐ श्री योगीशाय नम: 
55, ॐ श्री योगधाम्रे नम: 
56, ॐ श्री उमासुताय नम: 
57, ॐ श्री आपद्धंत्रे नम: 
58, ॐ श्री एकदंताय नम: 
59, ॐ श्री महाग्रीवाय नम: 
60, ॐ श्री शरण्याय नम: 
61, ॐ श्री सिद्धसेनाय नम: 
62, ॐ श्री सिद्धवेदाय नम: 
63, ॐ श्री करुणाय नम: 
64, ॐ श्री सिद्धाय नम: 
65, ॐ श्री भगवते नम: 
66, ॐ श्री अव्यग्राय नम: 
67, ॐ श्री विकटाय नम: 
68, ॐ श्री कपिलाय नम: 
69, ॐ श्री ढुंढिराजाय नम: 
70, ॐ श्री उग्राय नम: 
71, ॐ श्री भीमोदराय नम: 
72, ॐ श्री शुभाय नम: 
73, ॐ श्री गणाध्यक्षाय नम: 
74, ॐ श्री गणेशाय नम: 
75, ॐ श्री गणाराध्याय नम: 
76, ॐ श्री गणनायकाय नम: 
77, ॐ श्री ज्योति:स्वरूपाय नम: 
78, ॐ श्री भूतात्मने नम: 
79, ॐ श्री धूम्रकेतवे नम: 
80, ॐ श्री अनुकूलाय नम: 
81, ॐ श्री कुमारगुरवे नम: 
82, ॐ श्री आनंदाय नम: 
83, ॐ श्री हेरंबाय नम: 
84, ॐ श्री वेदस्तुताय नम: 
85, ॐ श्री नागयज्ञोपवीतिने नम: 
86, ॐ श्री दुर्धषाय नम: 
87, ॐ श्री बालदुर्वांकुरप्रियाय नम: 
88, ॐ श्री भालचंद्राय नम: 
89, ॐ श्री विश्वधात्रे नम: 
90, ॐ श्री शिवपुत्राय नम: 
91, ॐ श्री विनायकाय नम: 
92, ॐ श्री लीलासेविताय नम: 
93, ॐ श्री पूर्णाय नम: 
94, ॐ श्री परमसुंदराय नम: 
95, ॐ श्री विघ्नांधकाराय नम: 
96, ॐ श्री सिंधुरवरदाय नम: 
97, ॐ श्री नित्याय नम: 
98, ॐ श्री विभवे नम: 
99, ॐ श्री प्रथमपूजिताय नम: 
100, ॐ श्री दिव्यपादाब्जाय नम: 
101, ॐ श्री भक्तमंदाराय नम: 
102, ॐ श्री शूरमहाय नम: 
103, ॐ श्री रत्नसिंहासनाय नम: 
104, ॐ श्री मणिकुंड़लमंड़िताय नम: 
105, ॐ श्री भक्तकल्याणाय नम: 
106, ॐ श्री कल्याणगुरवे नम: 
107, ॐ श्री सहस्त्रशीर्ष्णे नम: 
108, ॐ श्री महागणपतये नम: