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Sunday, August 11, 2013

सोच की परिधि

कितना भी सोचु कि अभी नही सोचूंगी पर सोचे फिर भी बार बार तुम्हे ही सोचती हैं और
सोच की परिधि से बाहर जाकर तुम " मैं" बन जाते हो और मैं खुद को भूल जाती हूँ .ये मन भी कितना बावला होता है न जिसको सोचना नही चाहिए वही सोचता हैं और जिन बातो को हमेशा अपनेदिमाग में रखना चाहिए वोह याद नही रखता हम हमेशा दायरों में रहकर अपनी सोचो को संकुचित रखते हैं तो तो भी सोचे बगावत कर जाती हैं . यह सोचे ही कभी हमें आसमान की अनंत उडान तो कभी रसातल की तरफ ले जाती हैं .सोचना इंसानी फितरत हैं इसलिय मैं भी सोचती हूँ बहुत कुछ ......हाँ बहुत कुछ ...पर आजतक मन का पक्षी अपनी उडान नही भर पाया .आज तक सोचे धरातल पर नही उतरी .आज तक त्रिशंकु की मानिद अटकी हैं .... नही सोच पाती मैं" तुम" बनकर और तुम बन' ना कोई आसान थोड़े हैं तुम तुम हो इसिलिय मैं सिर्फ मैं ही रह गयी हूँ सोचो में तुमको सोचते हुए अपने मन के कोने से ...........नीलिमा

Wednesday, February 6, 2013

प्रेम

तुम्हे पता भी हैं :-< कब से मैंने एक लफ्ज़ भी तुम पर नही लिखा , जबकि हर वक़्त मेरे ज़हन में तुम रहते हो । तुम्हारी बाते जो तुम लफ्जों से कहते थे , इशारों से कहते थे और कभी कभी तुम सिर्फ पलके उठाकर मुझे देखते थे और मैं समझ जाती थी मायने तुम्हारी हर अनकही बात का भी .
तुम्हारे दिल के उस कोने में जहाँ सिर्फ और सिर्फ मैं ही बसेरा करती हूँ जानती हूँ मेरे लिए कैसे अनुभव करता हैं । दूरियाँ कितनी भी रही सिर्फ एक मूक सी अनुभूति ने हमारे दिलो को इतना करीब रखा कि एक तिनका भी कसमसा उठे . हाँ मुझे पसंद हैं तुम्हारे हिसाब से जीना तुम्हारे हिसाब से चलना ,
मुझे नही चाहिए आज़ादी इस दुनिया में . मुझे रहना हैं तुम्हारे संग तुम्हारे बन्धनों में , किसी भी दुनिया के उस कोने में जहाँ हम हो तुम हो और बस जाए एक कायनात ................... मुझे प्रेम हैं तुमसे . हाँ मुझे सच्ची में प्रेम हैं तुमसे और मुझे इस के लिए किसी दिन की जरुरत नही मगर फिर भी .......... मुझे प्रेम हैं तुमसे इस लिए कभी लफ्जों का सहारा लेती हूँ तो कभी गुलाबो का , तभी प्रेम तरोताजा सा महकता हैं हमारे मध्य ..............


एक ख्याल मन के कोने से .......................