Wednesday, February 6, 2013

प्रेम

तुम्हे पता भी हैं :-< कब से मैंने एक लफ्ज़ भी तुम पर नही लिखा , जबकि हर वक़्त मेरे ज़हन में तुम रहते हो । तुम्हारी बाते जो तुम लफ्जों से कहते थे , इशारों से कहते थे और कभी कभी तुम सिर्फ पलके उठाकर मुझे देखते थे और मैं समझ जाती थी मायने तुम्हारी हर अनकही बात का भी .
तुम्हारे दिल के उस कोने में जहाँ सिर्फ और सिर्फ मैं ही बसेरा करती हूँ जानती हूँ मेरे लिए कैसे अनुभव करता हैं । दूरियाँ कितनी भी रही सिर्फ एक मूक सी अनुभूति ने हमारे दिलो को इतना करीब रखा कि एक तिनका भी कसमसा उठे . हाँ मुझे पसंद हैं तुम्हारे हिसाब से जीना तुम्हारे हिसाब से चलना ,
मुझे नही चाहिए आज़ादी इस दुनिया में . मुझे रहना हैं तुम्हारे संग तुम्हारे बन्धनों में , किसी भी दुनिया के उस कोने में जहाँ हम हो तुम हो और बस जाए एक कायनात ................... मुझे प्रेम हैं तुमसे . हाँ मुझे सच्ची में प्रेम हैं तुमसे और मुझे इस के लिए किसी दिन की जरुरत नही मगर फिर भी .......... मुझे प्रेम हैं तुमसे इस लिए कभी लफ्जों का सहारा लेती हूँ तो कभी गुलाबो का , तभी प्रेम तरोताजा सा महकता हैं हमारे मध्य ..............


एक ख्याल मन के कोने से ....................... 

4 comments:

हरकीरत ' हीर' said...

मुझे रहना हैं तुम्हारे संग तुम्हारे बन्धनों में , किसी भी दुनिया के उस कोने में जहाँ हम हो तुम हो और बस जाए एक कायनात ...................

प्रेम खुद ब खुद सबकुछ करा देता है ...जहां अहम आ जाये प्रेम खत्म हो जाता है ....
पर एक तरफ़ा भी ज़िंदा नहीं रह पाता .....!!

Manohar Chamoli said...

hummmmmmm!!

Neelima said...

THNK U FRDS

darshanjangra.blogspot.com said...

तुम्हे पता भी हैं :-< कब से मैंने एक लफ्ज़ भी तुम पर नही लिखा , जबकि हर वक़्त मेरे ज़हन में तुम रहते हो ।